इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि आरोपी अपने बचाव में साक्ष्य प्रस्तुत करने के चरण में स्वेच्छा से नार्को टेस्ट कराना चाहता है तो उसे रोका नहीं जा सकता। यह उसके निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का हिस्सा है। लिहाजा, अदालत निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार से आरोपी को वंचित नहीं कर सकती।
इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना की अदालत ने पॉक्सो मामले के आरोपी ललित कौशिक की ओर से नार्को टेस्ट की मांग स्वीकार कर ली। याची ने मुरादाबाद की विशेष अदालत की ओर से नार्को टेस्ट करवाने की मांग को खारिज करने वाले आदेश को चुनौती दी थी। मामला सिविल लाइंस थाना क्षेत्र का है। याची ने खुद के बचाव में नार्को टेस्ट की मांग की थी लेकिन ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए इन्कार कर दिया कि विवेचना पूरी हो चुकी है। अभियोजन और बचाव पक्ष के साक्ष्य की प्रक्रिया भी पूरी कर ली गई है। इस स्तर पर मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।
याची ने इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश निरस्त कर दिया। कहा कि आरोपी अपने खर्च पर नार्को टेस्ट करा सकता है जिसे उसके बचाव साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जाएगा। इस प्रक्रिया में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन किया जाए। साथ ही मामले की सुनवाई पॉक्सो अधिनियम के प्रावधानों के मुताबिक शीघ्र पूरी किया जाना चाहिए।