41 साल पुराना है मामला
बांदा के विशेष न्यायाधीश ने 25 जनवरी 1985 को तीनों को घर में घुस कर हत्या करने का दोषी ठहराते हुए सात-सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ तीनों ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। अपील लंबित रहने के दौरान रामराज की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनके खिलाफ अपील समाप्त कर दी गई। जीवित बचे जगनायक सिंह और संतोष की अपील कोर्ट ने सुनवाई की।
कोर्ट ने पाया कि विवेचना बेहद लापरवाही से की गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि घर में सेंधमारी के अपराध में दोषसिद्धि के लिए अभियोजन को यह साबित करना जरूरी है कि आरोपियों ने रात में घर में सेंध लगाकर या छिपकर प्रवेश करने का अपराध संयुक्त रूप से किया था। केवल हत्या होने से इस अपराध के तहत सभी आरोपियों का दायित्व अपने आप साबित नहीं हो जाता।हाईकोर्ट ने पाया कि दीनदयाल की मृत्यु और धुरिया को चोटें आने का तथ्य सामने आया, लेकिन अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि अपीलकर्ता ही अपराध में शामिल थे। इसी आधार पर अदालत ने दोनों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।