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विवेचना की खामियों पर हाईकोर्ट हैरान : आंगन के दरवाजे पर खून, शव चरपाई पर कैसे पहुंचा

Fri, 09 Oct 2026 08:06 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब 41 साल पुराने हत्या और डकैती के प्रयास से जुड़े मामले की सुनवाई में विवेचना पर हैरानी जताई। कहा कि घटनास्थल के आंगन में दरवाजे के पास खून मिला था, जबकि मृतक का शव चारपाई पर पाया गया।
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अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब 41 साल पुराने हत्या और डकैती के प्रयास से जुड़े मामले की सुनवाई में विवेचना पर हैरानी जताई। कहा कि घटनास्थल के आंगन में दरवाजे के पास खून मिला था, जबकि मृतक का शव चारपाई पर पाया गया। इसके बावजूद विवेचक ने यह पता लगाने की कोशिश ही नहीं की कि घायल को चारपाई तक कैसे और किन परिस्थितियों में लाया गया।

इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी की एकल पीठ ने जगनायक सिंह और संतोष की अपील स्वीकार कर ली। साथ ही उन्हें मिली सात-सात साल के कठोर कारावास की सजा का आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि संदेह कितना भी गहरा क्यों न हो, वह कानूनी साक्ष्य का विकल्प नहीं बन सकता।

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मामला बांदा जिले के पैलानी थाना क्षेत्र के अलीना गांव का है। अभियोजन के अनुसार, 27 सितंबर 1983 की रात दीनदयाल की घर में घुसकर हत्या कर दी गई थी। उनकी पत्नी धुरिया भी घायल हुई थीं। आरोप था कि जगनायक सिंह तमंचा, संतोष फारसा और रामराज लाठी लेकर घर में घुसे थे। लूटपाट के प्रयास का विरोध करने पर दीनदयाल की हत्या कर दी गई।

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41 साल पुराना है मामला

बांदा के विशेष न्यायाधीश ने 25 जनवरी 1985 को तीनों को घर में घुस कर हत्या करने का दोषी ठहराते हुए सात-सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ तीनों ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। अपील लंबित रहने के दौरान रामराज की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनके खिलाफ अपील समाप्त कर दी गई। जीवित बचे जगनायक सिंह और संतोष की अपील कोर्ट ने सुनवाई की।

कोर्ट ने पाया कि विवेचना बेहद लापरवाही से की गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि घर में सेंधमारी के अपराध में दोषसिद्धि के लिए अभियोजन को यह साबित करना जरूरी है कि आरोपियों ने रात में घर में सेंध लगाकर या छिपकर प्रवेश करने का अपराध संयुक्त रूप से किया था। केवल हत्या होने से इस अपराध के तहत सभी आरोपियों का दायित्व अपने आप साबित नहीं हो जाता।हाईकोर्ट ने पाया कि दीनदयाल की मृत्यु और धुरिया को चोटें आने का तथ्य सामने आया, लेकिन अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि अपीलकर्ता ही अपराध में शामिल थे। इसी आधार पर अदालत ने दोनों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।

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