इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कर्मचारी के खिलाफ विभागीय गवाहों को पेश किए बगैर पूरी की गई जांच प्रक्रिया अवैध होती है। लिहाजा, इसके परिणामस्वरूप दिया गया वृहद दंड कानून की नजर में गैरकानूनी है। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति अजय भनोट की अदालत ने मुरादाबाद के विद्युत विभाग के कार्यकारी सहायक ईशान माथुर के खिलाफ पारित तीन वेतन वृद्धि रोकने, निंदा प्रविष्टि व 10 लाख 77 हजार रुपये वसूली का आदेश रद्द कर दिया।
याची पर गबन के मामले में अपने अधीनस्थ पेट्रोल मैन (कुली) के पर्यवेक्षण में लापरवाही बरतने का आरोप था। याची के अधिवक्ता प्राणेश कुमार मिश्रा ने दलील दी कि विभागीय जांच के दौरान किसी भी गवाह को जांच अधिकारी के समक्ष पेश नहीं किया गया और न ही याची को जिरह का अवसर मिला। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए मामले को नए सिरे से जांच चार महीने मेंं जांच पूरी करने का आदेश दिया है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जांच शुरू करने से पहले याची को विभागीय गवाहों की सूची व प्रतिकूल दस्तावेजों की प्रतियां उपलब्ध कराई जाएं। साथ ही जांच अधिकारी सुनवाई की तिथियों की जानकारी भी समय से दें, जिससे याची गवाहों से जिरह कर सके।
जांच कार्यवाही में साक्ष्य के लागू मानकों के अनुसार याची के खिलाफ आरोपों को साबित करने के लिए विभागीय गवाहों को पेश करना अनिवार्य था। जब गवाहों को पेश ही नहीं किया गया तो याची को जिरह का अवसर भी नहीं मिल सकता। ऐसी स्थिति में पूरी जांच प्रक्रिया दोषपूर्ण मानी जाएगी।
- इलाहाबाद हाईकोर्ट