इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यौन अपराध के मामले में पीड़िता की गवाही महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे बिना जांचे-परखे अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। उसकी गवाही की विश्वसनीयता, सच्चाई और परिस्थितियों के अनुरूप होने का आकलन करना जरूरी है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यौन अपराध के मामले में पीड़िता की गवाही महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे बिना जांचे-परखे अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। उसकी गवाही की विश्वसनीयता, सच्चाई और परिस्थितियों के अनुरूप होने का आकलन करना जरूरी है।
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इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद की एकल पीठ ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों में विरोधाभास, प्राथमिकी में देरी और गवाहों के बयानों में विसंगतियां पाते हुए तीन आरोपियों को सामूहिक दुष्कर्म मामले में बरी कर दिया। फतेहपुर के बिंदकी क्षेत्र में 17 अक्तूबर 1983 की रात दो महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म का आरोप लगाया गया था। इसमें सिराजुल, छोटेलाल और फक्कू, मोहम्मद अनीस व दो अन्य पर घर में घुसकर और तमंचा दिखाकर वारदात को अंजाम देने का आरोप था।
घटना के छह दिन बाद प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। ट्रायल कोर्ट ने अप्रैल 1985 में आरोपियों को दोषी ठहराते हुए 10 साल की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। मुख्य आरोपी मोहम्मद अनीस की अपील उसकी मृत्यु होने के चलते समाप्त कर दी गई थी।
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याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि प्राथमिकी दर्ज कराने में देरी का स्पष्ट कारण नहीं बताया गया है। पीड़िताओं के बयानों में विरोधाभास है। चिकित्सकीय साक्ष्यों से भी आरोपों की पुष्टि नहीं हुई है। कोर्ट ने पाया कि शुरुआती शिकायत में दो अन्य कथित आरोपियों के नाम का उल्लेख नहीं था, जबकि बाद में उनकी भूमिका बताई गई। विवेचक ने भी गवाही में कहा कि पहली पीड़िता ने पूछताछ के दौरान उन दोनों के नाम नहीं बताए थे। दोनों पीड़िताओं के बयानों में घटनाक्रम, आरोपियों की भूमिका आदि में विसंगतियां थीं। चिकित्सकीय परीक्षण में भी दोनों महिलाओं के शरीर पर कोई ताजी बाहरी या आंतरिक चोट नहीं मिली थी। इन्हीं आधारों पर सभी को बरी कर दिया।