इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी के पास अपना भरण-पोषण करने के साधन नहीं हैं, जबकि पति के पास पर्याप्त आय के स्रोत हैं। ऐसे में पति अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने के लिए कानूनन बाध्य है। यह टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति संजय कुमार की एकल पीठ ने परिवार न्यायालय के पत्नी के पक्ष में दिए गए गुजारा-भत्ता के आदेश को बरकरार रखते हुए पति की पुनरीक्षण अर्जी खारिज कर दी।
फिरोजाबाद की रहने वाली धीरजेश ने पति बृजमोहन के खिलाफ भरण-पोषण का आवेदन दायर किया था। परिवार न्यायालय ने छह सितंबर 2022 को आदेश दिया कि बृजमोहन को आवेदन की तारीख से 3000 रुपये प्रतिमाह और आदेश की तारीख से 5000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया है। इस आदेश को चुनौती देते हुए पति ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की।
याची अधिवक्ता ने दलील दी कि लगाए गए सारे आरोप झूठे हैं। पत्नी स्वेच्छा से घर छोड़कर गईं और वह ट्यूशन व सिलाई का काम करके प्रतिमाह लगभग 10 हजार रुपये कमाती हैं। इसलिए भरण-पोषण की पात्र नहीं हैं। प्रतिवादी अधिवक्ता ने दलील दी दोनों का विवाह 17 फरवरी 2012 को हुआ था। 23 जुलाई 2013 को दहेज के लिए पत्नी की पिटाई की गई, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में इलाज कराना पड़ा। पति ने उन्हें घर से निकाल दिया और तब से वह अपने मायके में रह रही हैं। पति बीएससी स्नातक हैं और उनके पास कृषि भूमि एवं शराब की दुकानों से अच्छी आय है।
कोर्ट ने कहा कि पति ने पत्नी की आय के दावे को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं दिया। पति ने स्वीकार किया है कि उनके पास चार बीघा कृषि भूमि है, वह अपने भाई की दुकान पर बैठते हैं। उनके नाम पैतृक संपत्ति भी है। वे शारीरिक रूप से स्वस्थ हैं और श्रम कर सकते हैं। अतः भरण-पोषण देने में असमर्थता का दावा खारिज करने योग्य है। कोर्ट ने कहा कि परिवार न्यायालय की ओर से निर्धारित भरण-पोषण की राशि दोनों पक्षों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति के अनुरूप है। इसी के साथ याचिका खारिज कर दी।