आरोप सिद्ध होने पर 2021 में किया गया था बर्खास्त
वर्ष 2020 में उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने सिरोही के खिलाफ जांच रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया और उसे सेवा से बर्खास्त करने की सिफारिश की थी। राज्य सरकार ने सिफारिश स्वीकार कर उन्हें 16 अप्रैल 2021 को सेवा से बर्खास्त कर दिया था। बर्खास्तगी के वक्त वह ललितपुर की जिला अदालत में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद पर तैनात थे। इस आदेश के खिलाफ उन्होंने याचिका दाखिल की थी।
याची के अधिवक्ता की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड की जांच के बाद कोर्ट ने पाया कि 2015 में हुई विभागीय जांच में उनके विरुद्ध लगाए गए आरोप सिद्ध पाए गए हैं। दोषसिद्धि का आदेश और जांच के निष्कर्ष सबूतों पर आधरित है।
कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि न्यायिक पद पर आसीन होने वाले व्यक्ति के लिए जरूरी है कि वह अनिवार्य आचार संहिता और आत्मसंयम के सिद्धांत का पालन करे। मौजूदा मामले में याची ने न्यायिक कदाचार की सारी सीमाओं को पार कर दिया है। जिस तरह पौराणिक काल में ''शिशुपाल'' को उसके अंतिम अपराध के लिए माफ नहीं किया गया था, उसी तरह याची ने भी एक ऐसा अंतिम अपराध किया है जिसके लिए उसे बख्शा नहीं जा सकता।
कोर्ट ने कहा...पहचान होने पर खराब मछली को टैंक में नहीं छोड़ते
कोर्ट ने बर्खास्तगी के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा एक बार खराब मछली की पहचान हो जाने के बाद उसे टैंक में नहीं रखा जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि न्यायालय न्याय का मंदिर है। इसकी पवित्रता काे बरकरार रखने के लिए उन्हें मंदिर के पुजारी की तरह काम करना चाहिए। उन्हें न केवल न्यायपीठ पर अपने कर्तव्यों के निर्वहन से जुड़े अनुष्ठानों का संचालन करना चाहिए, बल्कि उत्साहपूर्वक इस मंदिर की पवित्रता की रक्षा भी करनी चाहिए। जो ऐसा नहीं कर सकता वह दया का पात्र भी नहीं हो सकता।