इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चा अपने किसी एक की अभिरक्षा में है तो भी उसके दूसरे अभिभावक की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका सुनवाई योग्य है। इस टिप्पणी के साथ मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र ने पूर्व में संरक्षक और प्रतिपाल्य एक्ट 1890 के तहत वैकल्पिक कानूनी उपाय होने की बात कह एकल पीठ के आदेश को रद्द कर दिया है। मामला बलिया निवासी रिंकू राम उर्फ रिंकू देवी और उनके करीब 15-20 माह के मासूम बेटे से जुड़ा है। अपीलकर्ता महिला का आरोप था कि पति पुलिस विभाग में है। उसने बच्चे को जबरन छीन लिया है।
बाल कल्याण समिति ने 10 सितंबर 2025 को बच्चे की अभिरक्षा मां को सौंपने का निर्देश दिया था पर आदेश का पालन नहीं हुआ। इसके बाद महिला हाईकोर्ट पहुंची तो एकल पीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका कर दी थी। कहा था कि पिता की ओर बच्चे को पास रखने को अवैध अभिरक्षा नहीं कहा जा सकता। इसके लिए उचित फोरम (सिविल कोर्ट) में जाना चाहिए। एकल पीठ के इस फैसले के खिलाफ रिंकू राम ने हाईकोर्ट में विशेष अपील दायर की। खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न नजीरों का हवाला देते हुए कहा कि बच्चों की अभिरक्षा के मामलों में बच्चे का कल्याण सर्वोपरि होता है।