इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि वकीलों को अदालत की कार्यवाही को व्यवस्थित और सम्मानजनक बनाए रखने में सहयोग करना चाहिए न कि उसमें व्यवधान डालें। यह तल्ख टिप्पणी कोर्ट ने एक वकील के मुवक्किल की दूसरी जमानत खारिज होने पर उसकी ओर से अदालत कक्ष में बहस जारी रखने पर नाराजगी जताते हुए की। न्यायमूर्ति कृष्ण पहल की पीठ सचिन गुप्ता की जमानत अर्जी पर सुनवाई कर रही थी।
गोरखपुर निवासी सचिन पर गोरखनाथ थाने में दुष्कर्म और आईटी एक्ट सहित विभिन्न मामलों में मुकदमा दर्ज है। उसने जमानत के लिए हाईकोर्ट में दूसरी अर्जी दाखिल की। पहली अर्जी पांच सितंबर 2024 को खारिज हुई थी। वकील ने दलील दी कि उनका मुवक्किल दिसंबर 2023 से जेल में है। अब तक केवल दो गवाहों से ही पूछताछ की गई है। ऐसे में मुकदमे के जल्द समाप्त होने की कोई संभावना नहीं है। इन आधारों पर जमानत देने की प्रार्थना की। शासकीय अधिवक्ता ने जमानत अर्जी का विरोध किया।
कोर्ट ने कहा कि कारावास की अवधि के अलावा जमानत अर्जी में अन्य कोई नया आधार नहीं है। नतीजतन अदालत ने जमानत अर्जी खारिज कर दी। अर्जी अस्वीकृत होने के बावजूद वकील ने लगातार यह तर्क दिया कि उनके मुवक्किल के पास जमानत का एक मजबूत मामला है। इससे अदालती कार्यवाही में बाधा उत्पन्न हुई। इस व्यवहार पर कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई। साथ ही इसे आपराधिक अवमानना के बराबर बताया लेकिन पीठ ने कार्यवाही शुरू करने से परहेज किया। कोर्ट ने कहा, आदेश पारित होने के बाद किसी भी वादी को न्यायालय की कार्यवाही में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं है।