न्यायमूर्ति श्रीधरन ने अपने 51 पृष्ठों के फैसले में कहा कि एफआईआर होने के तुरंत बाद मकान गिराने की कार्रवाई अक्सर जनभावनाओं और प्रतिशोध की भावना से प्रेरित प्रतीत होती है। उन्होंने इसे कार्यपालिका के विवेक का प्रतिशोधात्मक व छद्म इस्तेमाल बताते हुए प्रस्ताव दिया कि एफआईआर की तारीख से दो साल तक आरोपी के आवासीय भवन को ध्वस्त करने की कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। साथ ही तीन साल या उससे अधिक समय से निवास कर रहे लोगों के मामलों में अवैध निर्माण हटाने से पहले एक साल का अग्रिम नोटिस देने का भी सुझाव दिया।
वहीं, न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने इन दोनों निर्देशों से असहमति जताई। कहा कि दो साल की अनिवार्य रोक और एक साल के अतिरिक्त नोटिस जैसी व्यवस्था न्यायालय की ओर से कानून बनाने के समान होगी, जो विधायिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप है। उनके अनुसार इससे वैध नगर नियोजन कानूनों का क्रियान्वयन प्रभावित होगा। अवैध निर्माण बचाने के लिए झूठी एफआईआर दर्ज कराने जैसी प्रवृत्ति भी बढ़ सकती है।
भ्रष्ट नगरपालिका और पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध भी कार्रवाई हो : खंडपीठ
दोनों न्यायाधीश इस बात पर एकमत रहे कि यदि राज्य केवल किसी आरोपी को निशाना बनाकर नगरपालिका कानूनों का इस्तेमाल करती है तो यह दुर्भावनापूर्ण और प्रतिशोधात्मक कार्रवाई मानी जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि यदि अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई की जाती है तो ऐसे भ्रष्ट नगरपालिका और पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध भी भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए, जिन्होंने निर्माण होने दिया।