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UP : पुलिस मुठभेड़ में पैरों में गोली मारने पर हाईकोर्ट नाराज, कहा- सजा देना न्यायपालिका का काम

Sat, 31 Jan 2026 11:54 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

Allahabad High Court : पुलिस मुठभेड़ के दौरान अपराधी के पैर में गोली मारने की आए दिन हो रही घटनाओं पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि किसी अपराधी को सजा देना न्याय पालिका का काम है। पुलिस का नहीं। घटन के दौरान किसी पुलिसकर्मी को चोट न लगना संदेह पैदा करता है। 
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इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस मुठभेड़ों में अभियुक्तों के पैरों में गोली मारने की बढ़ती घटनाओं पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी आरोपी को सजा देने का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है, पुलिस के पास नहीं। कोर्ट ने इसे कानून के शासन और सांविधानिक मर्यादाओं के खिलाफ बताते हुए राज्य सरकार और पुलिस अधिकारियों को सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं। यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने राजू उर्फ राजकुमार की जमानत अर्जी पर दिया है।

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अदालत ने राजू को सशर्त जमानत दे दी है। कोर्ट ने दिशा-निर्देशों की अनदेखी पर अवमानना की कार्यवाही की चेतावनी भी दी है।मिर्जापुर निवासी राजू पर कोतवाली देहात थाने में विभिन्न आरोपों में प्राथमिकी दर्ज है। उसने जमानत के लिए हाईकोर्ट में अर्जी दायर की थी। याची की अधिवक्ता कुसुम मिश्रा ने दलील दी कि याची को झूठे मामले में फंसाया गया। कथित पुलिस मुठभेड़ में सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों का पालन नहीं किया गया।

कोर्ट ने इसे गंभीरता से लेते हुए अपर मुख्य सचिव (गृह) व डीजीपी को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये तलब कर जवाब मांगा था। शुक्रवार को दोनों अधिकारी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये हाजिर हुए और भरोसा दिलाया कि मुठभेड़ मामले में सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों का कड़ाई से पालन करने के लिए सर्कुलर जारी किए गए हैं। इनका पालन न करने पर कार्रवाई की जाएगी।
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किसी पुलिसकर्मी को चोट नहीं आई, संदेह होता है...

कोर्ट कहा कि हाल के दिनों में छोटे-छोटे अपराधों, जैसे चोरी या लूट के मामलों में भी पुलिस की ओर से मुठभेड़ दिखाकर आरोपियों के पैरों में गोली मारने की घटनाएं सामने आ रही हैं। वर्तमान मामले में किसी भी पुलिसकर्मी को चोट नहीं आई है। इससे संदेह होता है।

मुठभेड़ में मौत या गंभीर चोट की स्थिति में तुरंत दर्ज हो एफआईआर

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य’ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि मुठभेड़ में मौत या गंभीर चोट की स्थिति में तुरंत एफआईआर दर्ज की जाए और जांच स्वतंत्र एजेंसी, जैसे सीबीसीआईडी या किसी अन्य थाने की टीम से कराई जाए। घायल व्यक्ति का बयान मजिस्ट्रेट या मेडिकल अधिकारी के समक्ष दर्ज करना अनिवार्य होगा।

साथ ही मुठभेड़ के तुरंत बाद संबंधित पुलिसकर्मियों को किसी प्रकार का पुरस्कार या पदोन्नति नहीं दी जाएगी। इन दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करने पर मुठभेड़ करने वाली टीम व संबंधित जिले के पुलिस प्रमुख (एसपी/एसएसपी/कमिश्नर) भी सीधे तौर पर अदालत की अवमानना के जिम्मेदार होंगे। सुनवाई के दौरान अपर मुख्य सचिव (गृह) और डीजीपी ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि इन निर्देशों का सख्ती से पालन कराया जाएगा।

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