इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऊषा चक्रवर्ती बनाम पश्चिम बंगाल मामले के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई विवाद दीवानी प्रकृति का है तो उसे आपराधिक मुकदमे का रूप देकर पक्षकारों को परेशान नहीं किया जा सकता।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऊषा चक्रवर्ती बनाम पश्चिम बंगाल मामले के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई विवाद दीवानी प्रकृति का है तो उसे आपराधिक मुकदमे का रूप देकर पक्षकारों को परेशान नहीं किया जा सकता। इस टिप्पणी संग कोर्ट ने आशा राठौर के विरुद्ध जारी समन आदेश और गैर-जमानती वारंट को रद्द कर दिया।
विज्ञापन
यह आदेश न्यायमूर्ति नंद प्रभा शुक्ला की पीठ ने दिया है। मेरठ निवासी आशा राठौर पर सदर बाजार थाने में धमकी देने, अपमान करने, चोट पहुंचाने व संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप में मुकदमा दर्ज है। याची ने दर्ज मुकदमे में ट्रायल कोर्ट की ओर से आठ मई 2025 को जारी समन आदेश व 14 मई-22 मई और 24 जून 2024 को जारी गैर-जमानती वारंट को चुनौती दी थी।
याची अधिवक्ता ने दलील दी कि समन आदेश बिना सोचे-समझे जारी किया गया है। याची 64 वर्षीय महिला है। उसके पति की मृत्यु हो चुकी है। शिकायतकर्ता और याची के पति के बीच सिविल विवाद पहले से चल रहा है। उक्त आपराधिक कार्यवाही याची को परेशान करने के लिए शुरू की गई है।
विज्ञापन
न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जब दीवानी विवाद पहले से लंबित हो तो उसी मुद्दे को लेकर आपराधिक कार्रवाई शुरू करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। कोर्ट ने समन आदेश और गैर-जमानती वारंट को निरस्त करते हुए मामला ट्रायल कोर्ट को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया।