इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि महज तकनीकी गलतियों के आधार पर किसी के लिए अदालत के दरवाजे बंद नहीं होते। लिहाजा, किसी अपील को पोषणीयता के आधार पर पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता। गलत प्रावधानों में दाखिल हो चुकी अपील उचित प्रारूप में बदल कर योग्यता के आधार पर फैसला सुनाया जाना चाहिए।
इस टिप्पणी के साथ मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने केंद्र सरकार की ओर से आर्बिट्रेशन एक्ट के तहत दाखिल अपील को संविधान के अनुच्छेद-227 के तहत रिट याचिका में तब्दील करने का आदेश दिया है। मामला केंद्र सरकार और मेसर्स रामजी पावर कंस्ट्रक्शंस लिमिटेड के बीच एक व्यावसायिक विवाद से जुड़ा है।
प्रयागराज के वाणिज्यिक न्यायालय ने 18 अक्तूबर 2024 को केंद्र सरकार की एक अर्जी पर सुनवाई से यह कहते हुए इन्कार कर दिया कि उसे इस मामले में सुनवाई का क्षेत्राधिकार नहीं है। इस फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार ने आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा-37 के तहत हाईकोर्ट में अपील की थी।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड मामले में दिए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि धारा-37 के तहत यह अपील तकनीकी रूप से पोषणीय नहीं है। हालांकि, केंद्र सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता की ओर से अपील को रिट याचिका में तब्दील करने की मांग की गई। इसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। संवाद
क्या है अनुच्छेद-227
अनुच्छेद-227 हाईकोर्ट को अपने अधीनस्थ अदालतों और न्यायाधिकरणों पर निगरानी रखने की विशेष शक्ति देता है। इसका उपयोग तब होता है, जब निचली अदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र का सही उपयोग न किया हो।