इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि पहली बार अपराध करने वालों को सजा देने से पहले उनकी सशर्त रिहाई पर विचार किया जाना चाहिए। प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 के तहत लाभ पाने के योग्य है तो लाभ मिलना चाहिए। यदि अदालत प्रोबेशन (सशर्त रिहाई) का लाभ नहीं देती है तो उसे इसके लिए विशेष कारण दर्ज करना अनिवार्य है। यह आदेश न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद ने हरि शंकर पांडेय और रुद्र नारायण की ओर से दाखिल आपराधिक अपील पर दिया है।
प्रयागराज निवासी अपीलकर्ताओं को ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 1988 में मारपीट व अन्य मामले में दो वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की। हाईकोर्ट में अपीलकर्ताओं के अधिवक्ता चंद्रशेखर मिश्रा ने दलील दी कि वे दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दे रहे हैं और उनकी आपत्ति केवल सजा को लेकर है। उन्होंने कहा कि दोनों आरोपी पहले कभी किसी अपराध में दोषी नहीं ठहराए गए हैं और पहली बार अपराध करने वाले हैं। इसलिए ट्रायल कोर्ट को प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 के तहत उन्हें सशर्त रिहा करने पर विचार करना चाहिए था।
हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने न तो प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट के प्रावधान लागू किए और न ही दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 360 पर विचार किया। इतना ही नहीं, इन प्रावधानों का लाभ नहीं देने के लिए कोई विशेष कारण भी दर्ज नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि आरोपियों को प्रोबेशन संबंधी लाभकारी कानून का लाभ मांगने का अधिकार है और ट्रायल कोर्ट का दायित्व था कि वह सशर्त रिहाई पर विचार करता।
हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए प्रोबेशन पर रिहा करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि आरोपियों को एक वर्ष तक शांति एवं सदाचार बनाए रखना होगा। भविष्य में इसी तरह का अपराध करने पर उन्हें ट्रायल कोर्ट की ओर से दी गई मूल सजा भुगतनी होगी।