सत्र न्यायालय ने 1983 में दोनों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए चार-चार साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने कहा कि गंभीर चोट का अपराध संदेह से परे सिद्ध नहीं हो सका। लेकिन ज्वलनशील पदार्थ से हमला करने और आधी रात को चोट पहुंचाने की तैयारी के साथ घर में घुसने का अपराध सिद्ध है।
कोर्ट ने कहा कि एसिड अथवा अन्य ज्वलनशील पदार्थ से हमला अत्यंत गंभीर अपराध है। ऐसे मामलों में प्रोबेशन (अच्छे आचरण पर रिहाई) का लाभ देने से समाज में गलत संदेश जाएगा और अपराधों के प्रति निवारक प्रभाव कमजोर पड़ेगा। इसलिए आरोपी को प्रोबेशन का लाभ नहीं दिया जा सकता।
हालांकि, कोर्ट ने कहा कि घटना को पांच दशक से अधिक बीत चुके हैं। अपील 1983 से लंबित थी। आरोपी पूरे समय जमानत पर रहा और उसके विरुद्ध किसी अन्य आपराधिक मामले का रिकॉर्ड भी नहीं है। कोर्ट ने कारावास की सजा को पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित करते हुए 40 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि जुर्माने की राशि जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को पीड़ित प्रतिकर और विधिक सहायता के लिए उपलब्ध कराई जाए।