उपाध्यक्ष के पद पर शाही परिवार के बड़े बेटे जितेंद्र पाल सिंह और अनिरुद्ध पाल सिंह के बीच दशकों से वर्चस्व की छिड़ी जंग हाईकोर्ट की दहलीज पर पहुंची है। कोर्ट ने मामले का निस्तारण करते हुए कहा कि अब राजा या वंशानुगत अधिकार के आधार पर सोसाइटी के पद नहीं बांटे जाएंगे। न ही शिक्षा के मंदिर को सत्ता और संपत्ति की अखाड़ा बनाने देंगे। कोर्ट ने बड़े भाई जितेंद्र पाल सिंह को एक दिसंबर 2025 से 31 मई 2028 व छोटे भाई अनिरुद्ध पाल सिंह को एक जून 2028 से 30 नवंबर 2030 तक उपाध्यक्ष के पद की जिम्मेदारी निभाने का आदेश दिया है।
राज्य सरकार को निर्देश
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में सोसाइटी की कोई वैधानिक समिति अस्तित्व में नहीं है। लिहाजा, राज्य सरकार सोसाइटी के बॉयलाज (उपनियमों) के मुताबिक एक जनवरी 2026 तक नया बोर्ड गठित कर सोसाइटी रजिस्ट्रार को सूचित करे।
कोर्ट की टिप्पणियां
- दोनों भाई अपनी विरासत को आगे बढ़ाने के बजाय ‘राजा’ की उपाधि के लिए लड़ रहे हैं। शिक्षा का यह मंदिर सत्ता और संपत्ति का अखाड़ा नहीं बन सकता।
- अब राजा आवागढ़ शाही जैसी कोई उपाधि मान्य नहीं है। कोई भी व्यक्ति सिर्फ जन्म या परंपरा के आधार पर सोसाइटी का उपाध्यक्ष नहीं बन सकता। इसमें सभी सदस्य बराबर का हक रखते हैं।
- उपाध्यक्ष के कार्यकाल का भाइयों में बराबर बंटवारा परिवार, विरासत और संस्थान तीनों के हित में संतुलन स्थापित करेगा। पुराने मतभेदों को खत्म करने में मील का पत्थर साबित होगा।