इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पैनल एडवोकेट से कथित अतिरिक्त फीस की एकतरफा वसूली के भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के आदेश को रद्द कर दिया। कहा, यह निर्णय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। अधिकारियों ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर एक कलंककारी आदेश पारित किया है। इससे याची को उसकी सेवाओं के बदले में दिए जाने वाले मुआवजे से वंचित किया जा रहा है।
यह आदेश न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ व न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने मनोज कुमार सिंह की याचिका पर दिया। इटावा निवासी याची भारतीय खाद्य निगम के पैनल अधिवक्ता हैं। एफसीआई की गठित एक समिति की जांच के आधार पर याची से 2017 से 2020 तक उनकी सेवाओं के लिए कथित रूप से अधिक भुगतान किए गए लगभग 17 लाख की वसूली के आदेश जारी किए गए। याची ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी।
याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि याची के विरुद्ध एकतरफ आदेश पारित किया गया। उसे कथित अतिरिक्त भुगतान को लेकर न कोई कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और न ही जांच रिपोर्ट दी गई। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ। वसूली आदेश याची पर कलंक लगाते हैं। ऐसे में भविष्य में उसकी सेवा समाप्त कर सकते हैं।
एफसीआई के अधिवक्ता ने दलील दिया कि कानून में कहीं भी यह प्रावधान नहीं है कि आंतरिक ऑडिट जांच की प्रति याची को प्रदान की जाए। याचिका खारिज किए जाने योग्य है। कोर्ट ने कहा, यदि कोई प्राधिकरण किसी व्यक्ति के खिलाफ कलंक लगने वाला आदेश पारित करता है तो उसे विधि सम्मत प्रक्रिया के तहत ही लागू किया जाना चाहिए। अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना दंड लागू नहीं किया जा सकता है।
इसके अलावा जांच रिपोर्ट की प्रति भी प्रदान की जानी चाहिए। वर्तमान मामले में ये आवश्यक तत्व नहीं हैं। अदालत ने विवादित आदेशों को रद्द कर दिया। साथ ही निर्देश दिया कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का पालन करते हुए दुबारा एफसीआई कार्रवाई कर सकती है।