इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाथरस नगर पालिका परिषद की निर्वाचित अध्यक्ष श्वेता चौधरी की वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों पर रोक लगाने के राज्य सरकार के आदेश पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा कि ठेका आवंटन में प्रथम दृष्टया अनियमितता का मामला हो सकता है, लेकिन अध्यक्ष को गंभीर कदाचार का दोषी मानने के लिए ठोस आधार होना जरूरी है। जिस ठेके को लेकर विवाद है, वह सबसे कम बोली लगाने वाले (एल-1) ठेकेदार को दिया गया था। निविदा प्रक्रिया में हेराफेरी करने या उसके निष्पक्ष परिणाम को प्रभावित करने का भी कोई आरोप नहीं है।
यह आदेश न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने श्वेता चौधरी की याचिका पर दिया। कोर्ट ने राज्य सरकार को 31 दिसंबर तक जांच पूरी करने का आदेश दिया है। साथ ही स्पष्ट किया कि सरकार जांच पूरी कर स्वतंत्र रूप से अंतिम आदेश पारित कर सकती है। मामला नगर पालिका क्षेत्र में ठोस कचरा संग्रहण के ठेके से जुड़ा है। आरोप था कि ठेका स्वीकृति का आदेश 12 अगस्त 2024 को जारी हुआ, जबकि तुलनात्मक चार्ट 14 अगस्त 2024 को तैयार किया गया।
याची की ओर से दलील दी गई कि अध्यक्ष के स्तर पर न तो निविदा आमंत्रित करने, न ही उसकी प्रक्रिया पूरी करने और न तुलनात्मक विवरण तैयार करने की जिम्मेदारी थी। राज्य सरकार के दस्तावेज से भी ठेका सबसे कम बोलीदाता को दिए जाने की बात सामने आई। कोर्ट ने पांच न्यायाधीशों की पूर्णपीठ के परस जैन बनाम उत्तर प्रदेश सरकार फैसले का हवाला दिया। कहा कि उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम की धारा 48(2) के तहत निर्वाचित अध्यक्ष की शक्तियां समाप्त करने से पहले निर्धारित कानूनी कसौटियों का पालन जरूरी है।
आरोपों के आधारहीन न होने और अध्यक्ष के प्रथम दृष्टया दोषी होने के संबंध में संतुष्टि के साथ विशिष्ट आरोपों का उल्लेख भी आवश्यक है। कोर्ट ने कहा कि मौजूदा सामग्री के आधार पर अध्यक्ष को गंभीर कदाचार का प्रथम दृष्टया दोषी मानने की संतुष्टि पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। इसी के साथ राज्य सरकार के चार अगस्त 2026 के आदेश का प्रभाव स्थगित कर दिया गया। हालांकि, जांच जारी रहेगी और अध्यक्ष को उसमें सहयोग करना होगा।