इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी ने कई लोगों के बयान दर्ज किए और पाया कि आरोपी दोनों प्रधानाचार्यों ने सह-आरोपियों संग मिलकर बिना सत्यापन के छात्रवृत्ति वितरित की। मौजूदा मामले में उपलब्ध सामग्री से यह नहीं कहा जा सकता कि प्रथम दृष्टया कोई अपराध नहीं हुआ है। इस टिप्पणी संग कोर्ट ने मुकदमे की संपूर्ण कार्यवाही को रद्द करने की मांग में दाखिल अर्जियां खारिज कर दीं। यह आदेश न्यायमूर्ति समीर जैन की एकल पीठ ने मदरसों के प्रधानाचार्यों शमशाद व शफीक उई हसन की अर्जियों पर दिया है।
मेरठ के ईओडब्ल्यू थाने में 2019 को मदरसा उस्मानिया अरबिया उलउलूम मेवगढ़ी मजीदनगर के प्रधानाचार्य शमशाद और मदरसा जियाउल कुरान परिछितगढ़ के प्रधानाचार्य शफीक उई हसन पर छात्रों की छात्रवृत्ति राशि का गबन करने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया था। आरोप था कि उन्होंने बिना किसी भौतिक और दस्तावेजी सत्यापन के छात्रवृत्ति राशि वितरित कर दी। आरोपियों ने आरोप पत्र, समन आदेश सहित मुकदमे की संपूर्ण कार्यवाही को रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल की गई।
आवेदक के वकील ने दलील दी कि उन्हें झूठे आरोपों में फंसाया गया है। छात्रवृत्ति का वितरण सह-आरोपियों सुमन गौतम (तत्कालीन जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी) और संजय त्यागी (कार्यालय में क्लर्क) के मार्गदर्शन और निर्देशों के तहत हुआ था। ऐसे में आवेदक के ऊपर लगाए गए सभी आरोप झूठे हैं और रद्द किए जाने चाहिए।
शासकीय अधिवक्ता ने मुकदमा रद्द करने की अर्जियों का विरोध किया। दलील दी कि शमशाद और शफीक उई हसन अलग-अलग मदरसे के प्रधानाचार्य थे। इन लोगों ने अन्य आरोपियों संग मिलकर छात्रवृत्ति राशि का गबन किया। जांच के दौरान आरोपियों के खिलाफ तथ्य पाए गए हैं। ऐसे में मुकदमा रद्द करने की अर्जियां खारिज की जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि किसी आरोपी के विरुद्ध लंबित मुकदमे की कार्यवाही और उसके खिलाफ दायर आरोप पत्र केवल दुर्लभतम मामलों में ही प्रारंभिक चरण में रद्द किया जा सकता।