इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यौन उत्पीड़न की शिकायत पॉश एक्ट-2013 की धारा-9 में निर्धारित समय सीमा के बाहर की जाती है तो उस पर संज्ञान नहीं लिया जा सकता। ऐसी स्थिति में मामले को नए सिरे से जांच के लिए वापस भेजना भी कानूनन उचित नहीं है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यौन उत्पीड़न की शिकायत पॉश एक्ट-2013 की धारा-9 में निर्धारित समय सीमा के बाहर की जाती है तो उस पर संज्ञान नहीं लिया जा सकता। ऐसी स्थिति में मामले को नए सिरे से जांच के लिए वापस भेजना भी कानूनन उचित नहीं है।
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इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने प्रयागराज निवासी की विशेष अपील स्वीकार कर ली, जबकि संस्थान की विशेष अपील खारिज कर दी। याची वर्ष 2005 में संस्थान में सहायक प्रोफेसर नियुक्त हुए थे। वर्ष 2016 में कुछ छात्राओं की ओर से उनके खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत की। आंतरिक शिकायत समिति ने जांच की और बाद में संस्थान की गवर्निंग कौंसिल ने नौ जुलाई 2017 को उन्हें फटकार की सजा देते हुए महिला छात्राओं और शोधार्थियों का शैक्षणिक पर्यवेक्षण करने से रोक दिया।
इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। एकल पीठ ने सात मई 2026 के आदेश से सजा को रद्द कर मामले पर संस्थान को नए सिरे से विचार करने के लिए वापस भेज दिया। इस फैसले के खिलाफ याची ने विशेष अपील दायर की। खंडपीठ ने पाया कि शिकायतों में घटनाओं की तारीखें दर्ज नहीं थीं। कोर्ट ने कहा कि पॉश एक्ट की धारा-9 के तहत शिकायत घटना से अधिकतम छह महीने के अंदर की जानी चाहिए। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया। कहा, प्रथम दृष्टया समय सीमा से बाहर शिकायत को शुरुआत में ही खारिज किया जा सकता है। स्पष्ट किया कि जब शिकायतें ही पोषणीय नहीं थीं तो नए सिरे से जांच का कोई आधार नहीं था।