हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि पुलिस भर्ती में शामिल होने वाला अभ्यर्थी यदि आवेदन के समय मुकदमे की जानकारी छिपाता है तो उसे भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने का अधिकार नहीं होगा। प्रदेश सरकार की विशेष अपील को मंजूर करते हुए मुख्य न्यायमूर्ति डीबी भोसले और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की खंडपीठ ने यह आदेश दिया।
पुलिस विभाग में सिपाहियों की भर्ती में तमाम ऐसे मामले सामने आए जिसमें चयनित अभ्यर्थी के चरित्र सत्यापन के दौरान पता चला कि उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा लंबित है। ऐसे अभ्यर्थियों को पुलिस भर्ती बोर्ड ने प्रशिक्षण पर जाने से रोक दिया था। रोके गए अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर दलील की कि उनके खिलाफ गंभीर मुकदमा नहीं है या मुकदमे रंजिशन दर्ज कराए गए हैं। एकलपीठ ने ऐसे मामलों में अभ्यर्थियों को प्रशिक्षण पर भेजने का आदेश दिया था।
इस आदेश को सरकार ने विशेष अपील में चुनौती दी। स्थायी अधिवक्ता रामानंद पांडेय ने तर्क दिया कि भर्ती का आवेदन करते समय ही अभ्यर्थी को इसकी घोषणा करनी चाहिए कि उनके खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज है या नहीं। मगर तमाम लोगों ने इस कॉलम को खाली छोड़ दिया। ऐसा करके वहे गलत तरीके से भर्ती प्रक्रिया में शामिल हो गए। यदि आवेदन में ही सही बात बता देते तो उनको आगे की प्रक्रिया में शामिल होने से रोक दिया जाता। भर्ती नियमों के तहत तथ्य छिपाना गलत है। खंडपीठ ने कहा कि आपराधिक मुकदमा दर्ज होने की जानकारी छिपाना भर्ती शर्तों का उल्लंघन है। अभ्यर्थियों को अपनी गलती का लाभ नहीं दिया जा सकता है। खंडपीठ ने एकल पीठ द्वारा तथ्य छिपाने वाले अभ्यर्थियों को प्रशिक्षण पर भेजने संबंधी आदेश रद्द कर दिया है।