श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद विवाद से जुड़े 18 सिविल वादों की पोषणीयता को लेकर पिछले कई दिनों से चल रही सुनवाई शुक्रवार को पूरी हो गई। न्यायमूर्ति मयंक कुमार जैन की अदालत में फैसला सुरक्षित कर लिया।
शाही ईदगाह प्रबंधन पर अवैध कब्जाधारी होने का आरोप लगाते हुए मथुरा सिविल कोर्ट में श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट से इतर कई सामाजिक, धार्मिक संस्थाओं ने सिविल वाद दाखिल किया था। शाही ईदगाह प्रबंधन कमेटी और वक्फ बोर्ड की ओर से इन सिविल वादों की पोषणीयता पर आपत्ति दर्ज कराई गई थी। मामला सिविल कोर्ट से हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। सुप्रीम कोर्ट ने सिविल वाद की पोषणीयता के बिंदु पर सभी 18 वादों को इलाहाबाद हाईकोर्ट स्थानांतरित कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति मयंक कुमार जैन की अदालत लगातार मामले की दिन प्रतिदिन सुनवाई कर रही थी।
हिंदू पक्ष का दावा
सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष के वादियों ने दावा किया कि जन्मभूमि की संपत्ति के राजस्व अभिलेखों में श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट का नाम दर्ज है। इस भूमि पर बनी शाही ईदगाह अवैध है। हिंदू पक्षकारों का दावा है कि श्रीकृष्ण लला विराजमान का विधिक अस्तित्व है। वह उनके भक्त हैं। इसलिए उन्हें वाद दाखिल करने का हक है। पक्षकारों की ओर से यह दलील भी दी गई कि संबंधित संपत्ति के पूर्ण भाग पर प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम 1958 के प्रावधान लागू हैं। इसकी अधिसूचना 26 फरवरी 1920 को ही जारी की जा चुकी है। अब इस संपत्ति पर वक्फ के प्रावधान लागू नहीं होंगे।
00मुस्लिम पक्ष की आपत्तियां
मुस्लिम पक्ष की ओर से दलील दी गई कि 1947 के पहले से ही श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर, ईदगाह के रास्ते और सीमाएं अलग-अलग हैं। मंदिर में प्रतिदिन पूजा हो रही है तो मस्जिद में नमाज पढ़ी जा रही है। जन्मभूमि ट्रस्ट और शाही ईदगाह प्रबंधन के बीच कोई विवाद नहीं है। दशकों बाद वादियों की ओर से बिना किसी विधिक हैसियत के सिविल वाद दाखिल किया गया, जो पोषणीय नहीं है। वादी पीड़ित पक्षकार नहीं हैं। क्योंकि वादीगण न तो श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट के ट्रस्टी हैं और न ही बनारस के राजा पटनीमल, महामना पंडित मदन मोहन मालवीय, गोस्वामी गणेशदत्त और भीखनलाल के वंशज हैं। इसके अलावा किसी भी सिविल वाद में इनके वंशजों को पक्षकार भी नहीं बनाया गया है। राजनैतिक लोकप्रियता के लिए निर्विवादित स्थल के धार्मिक चरित्र को जानबूझकर विवादित बनाने की कोशिश की जा रही है।
फैसला सुरक्षित
बहस के दौरान दोनों पक्षों की ओर से उपासना अधिनियम, परिसीमा अधिनियम, वक्फ बोर्ड अधिनियम पर कई दिनों तक विस्तार से वाद और प्रतिवाद चला। इसके बाद बृहस्पतिवार को मुस्लिम पक्ष की ओर से लिखित बहस भी अदालत में दाखिल की गई, जिसके बाद अदालत ने शुक्रवार को फैसला सुरक्षित कर लिया।