कोर्ट ने अपने फैसले में डॉ.भीमराव आंबेडकर के दर्शन का जिक्र किया था। कहा था की डॉ.आंबेडकर के सपनों के भारत में जाति राष्ट्र-विरोधी है। क्योंकि, यह अलगाव पैदा करती है। हमें 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है तो इसकी शुरुआत बच्चों के मन से भेदभाव मिटाकर करनी होगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना किसी ठोस कानूनी आधार के बच्चों की जाति दर्ज करना उनकी गरिमा और संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। बच्चों को बचपन में ही किसी संकीर्ण पहचान में बांधने के बजाय उन्हें केवल एक इंसान और भारतीय नागरिक के रूप में देखा जाना चाहिए।
अब भाई की कस्टडी में है पीड़िता
सुनवाई के अंत में अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि पीड़िता (नाबालिग बहन) अब अपने भाई की सुरक्षित कस्टडी में है। इस पर संतोष जताते हुए कोर्ट ने याचिका को निस्तारित कर दी।