‘मधुशाला’ जैसी अमर कृति से अमिट छाप छोड़ने वाले प्रख्यात साहित्यकार और कवि हरिवंश राय ‘बच्चन’ अपने ही गांव में बिसरा दिए गए हैं। पैतृक गांव बाबूपट्टी में ही उनसे जुड़ीं स्मृतियां बिखरी पड़ी हैं, मगर कभी सहेजी नहीं गईं। कभी थोड़े-बहुत प्रयास जरूर हुए, पर परवान नहीं चढ़े। इस कड़ी में उनकी याद में बने पुस्तकालय का नाम लिया जा सकता है। यहां किताबें तो नहीं मिलेंगी, हां...गर्द से ढंकी उनकी तस्वीर जरूर लगी है। दो कमरे और एक बड़ा हॉल, जिसमें किताबें रखने के लिए रैक बने हैं, जो कि खाली हैं। यहां उनकी बहू जया बच्चन के साथ एक बड़े नेता की पेंटिंगनुमा होर्डिंग और ‘बाबूजी’ की छोटी सी फोटो रखी है। उनकी 109 वीं जयंती पर गोष्ठियां होंगी, श्रद्धांजलि दी जाएगी, मगर उनके अपने ही गांव के पुस्तकालय में उनकी तस्वीर पर जमा धूल भी नहीं पोछी गई।
‘बच्चन’ इलाहाबाद में रहते हुए खुद दो बार ही पैतृक गांव आ सके, लेकिन उनकी आत्मकथा ‘क्या भूलूं क्या याद करूं’ में पुरखों की माटी के प्रति लगाव और प्रेम साफ झलकता है। अपनी किताब में पहली बार विश्वनाथगंज और दूसरी बार दांदूपुर स्टेशन पर ट्रेन से उतरकर पैदल गांव पहुंचने के बाद जिस नीम के चौरे और कुएं का जिक्र उन्होंने किया है, वह आज भी है। ‘बाबूजी’ से मिली यादों को ताजा करने और पुरखों की माटी से नाता जोड़ने के लिए बहू जया बच्चन 5 मार्च 2006 को बाबूपट्टी जरूर आईं, लेकिन उनका यह कार्यक्रम सियासी बन गया। उन्होंने परंपरा के मुताबिक नीम चौरे का पूजन किया। ‘बच्चन’ की याद में पुरखों की जमीन पर डॉ. हरिवंश राय बच्चन स्मारक पुस्तकालय की नींव रखी और लड़कियों के लिए डिग्री कॉलेज खोलने का वादा किया।
डेढ़ घंटे तक रहने के दौरान उन्होंने खुद को गांव की बहू बताते हुए बराबर आने-जाने और पति अमिताभ बच्चन के साथ बेटे अभिषेक बच्चन और बहू ऐश्वर्या राय बच्चन को भी साथ लाने का वादा किया, लेकिन दोबारा न वह खुद आईं न उनके परिवार का कोई सदस्य। तत्कालीन सांसद सीएन सिंह ने जैसे-तैसे पुस्तकालय भवन का निर्माण कराया। गांव के लोग बताते हैं कि इसमें रखने के लिए पुस्तकें भी लाई गईं, लेकिन बाद में वापस मंगा ली गईं। गर्ल्स डिग्री कालेज खोलने के लिए गांव के बाहर खरीदी गई साढ़े तीन बीघा जमीन अभी भी है। इस पर आगे कोई काम नहीं हो सका और मामला ठंडे बस्ते में चला गया। नीम के चौरे और सैकड़ों साल पुराने कुएं के जीर्णोद्धार का काम भी अधूरा है। पुस्तकालय भवन में चारों तरफ भीषण गंदगी है। बांस-बल्ली, कूड़ा-करकट और रामलीला का सामान रखा है। इसका ताला भी कभी-कभार ही खुलता है। हरिवंश राय के जन्मदिन पर पहले गांव में उनके पट्टीदार नीम के चौरे पर रामायण का पाठ करते थे, अब वह भी बंद हो गया।
मुख्यमंत्री अखिलेश भी आए थे जन्मदिन मनाने
प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी एक बार नवंबर 2007 में हरिवंश राय बच्चन के गांव में अपना जन्मदिन मनाने आए थे। तब वह सांसद थे। कवि सम्मेलन और मुशायरे के बीच अखिलेश ने अपना जन्मदिन तो मनाया, लेकिन उनका कार्यक्रम सियासी ही रहा। उन्होंने कई बार ‘बाबूजी’ का जिक्र तो किया, लेकिन उनकी याद में न तब कुछ घोषणा की न अब मुख्यमंत्री रहते हुए।