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जयंती पर विशेष : खरमस्त, लालसखा सहित कई छद्म नामों से लिखते थे ठाकुर श्रीनाथ सिंह, बाल साहित्य में बनाई पहचान

Mon, 30 Sep 2024 04:20 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

आचार्य पृथ्वीनाथ पांडेय ने बताया कि संपादक को अपनी समाचारपत्र-पत्रिकाओं का अस्तित्व बचाए और स्तर बनाए रखने के लिए ऐसा करना पड़ता है। मुझे स्वयं अपने संपादन में पत्र-पत्रिकाओं मे 'डॉ निशा नाथ', 'प्रियंवदा', 'नचिकेता', 'कात्यायन', डॉ. 'अचला पांडेय', 'विश्वबंधु', 'मनंजय मयंक', 'पृनापा', 'साहित्यिक' इत्यादि नामों से लेखन करने पड़े थे।'' वे आरंभ मे अपने मूल नाम 'श्रीनाथ सिंह' के नाम से लिखा करते थे; बाद मे 'ठाकुर' शब्द जोड़ दिया। 
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ठाकुर श्रीनाथ सिंह। फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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हिंदी बाल पत्रकारिता के माध्यम से देश में अपनी पहचान बनाने वाले ठाकुर श्रीनाथ सिंह का जन्म एक अक्तूबर, 1901 को इलाहाबाद के बारा मानपुर गांव में हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद को अपनी कर्मभूमि बनाकर साहित्यिक और पत्रकारिता को गति देने का प्रभावपूर्ण रचनात्मक कार्य किया था। वर्ष 1996 में में उनका निधन हो गया। भाषाविज्ञानी और सौ से अधिक बाल साहित्य-कृतियों के लेखक आचार्य पंडित पृथ्वीनाथ पांडेय यदा-कदा ठाकुर श्रीनाथ सिंह के ममफोर्डगंज स्थित निवास में जाकर उनसे भेंटकर उनसे रचनात्मक संवाद किया करते थे।

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आचार्य ने बताया, "बहुत कम लोग जानते हैं कि 'इंडियन प्रेस', इलाहाबाद के संपादकों में बहुआयामी प्रतिभा के धनी देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'सरस्वती' और बालपत्रिका 'बालसखा' एवं 'दीदी' के संपादक श्रीनाथ सिंह बीस से साठ के दशक में बाल-साहित्यकारों के अभाव में विविध नामों से रचनाएं लिखते थे। यदि नहीं लिखते तो पत्रिकाओं का प्रकाशन संभव ही नहीं था। यही कारण था कि उन्हें कई नामों का सहारा लेना पड़ता था। वे 'खरमस्त', 'लाल कवि', 'लालसखा', 'कुसुम कुमारी देवी कलि',  'श्यामाबाई', 'लछमी कान्त वर्मा', 'श्रीश' इत्यादिक छद्म नामों कविता और लेख लिखते थे।

आचार्य पृथ्वीनाथ पांडेय ने बताया कि संपादक को अपनी समाचारपत्र-पत्रिकाओं का अस्तित्व बचाए और स्तर बनाए रखने के लिए ऐसा करना पड़ता है। मुझे स्वयं अपने संपादन में पत्र-पत्रिकाओं मे 'डॉ निशा नाथ', 'प्रियंवदा', 'नचिकेता', 'कात्यायन', डॉ. 'अचला पांडेय', 'विश्वबंधु', 'मनंजय मयंक', 'पृनापा', 'साहित्यिक' इत्यादि नामों से लेखन करने पड़े थे।'' वे आरंभ मे अपने मूल नाम 'श्रीनाथ सिंह' के नाम से लिखा करते थे; बाद मे 'ठाकुर' शब्द जोड़ दिया। 
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आचार्य पांडेय  बताते हैं कि ठाकुर श्रीनाथ सिंह इंडियन प्रेस के संपादकों में एकमात्र ऐसे संपादक थे, जिन्होंने वहां से प्रकाशित सर्वाधिक पत्रिकाओं के संपादक किए हैं। जिनमें 'बालसखा' (1927-45), 'सरस्वती' (1933-1938), 'हल' (1931), 'देशदूत' (साप्ताहिक एवं दैनिक) सम्मिलित थे। इससे जाहिर है कि वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। इनके अतिरिक्त उन्होंने सुदर्शन प्रेस, इलाहाबाद से प्रकाशित 'दैनिक देशंधु', दीदी प्रेस, इलाहाबाद से प्रकाशित 'दीदी' एवं 'बालबोध' तथा मित्र प्रकाशन, इलाहाबाद से प्रकाशित 'मनमोहन' पत्रिका के संपादन किया।  ठाकुर श्रीनाथ सिंह की विविध वर्ग के पाठकों के लिए पुस्तकें अति लोकप्रिय रही हैं, जिनमें 'क्षमा', 'प्रेम परीक्षा', 'उलझन', 'नयनतारा', 'अपहृता' इत्यादि हैं। उनकी बालसाहित्य-कृतियां 'दो कुबड़े', 'पृथ्वी की कहानी', 'परी देश की सैर', 'गुब्बारा' आदि हैं। 

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