माघ मेला, अर्धकुंभ, कुंभ से पहले सड़कें खोद दी जाती हैं। विभागों में तालमेल नहीं है। एक सड़क बनाता है तो दूसरा उसे खोद कर छोड़ देता है। चार किलोमीटर की दूरी में कम से कम 20 जगह कूड़े का ढेर है। गलियां ध्वस्त पड़ी हों, लेकिन पार्षद की गली में इंटरलॉकिंग मिल जाती है। घर के आसपास का कूड़ा शिकायत करने पर माह या दो माह में एक बार हट जाता है, बाकी दिन गंदगी बजबजाती रहती है। ऐसे ही तमाम समस्याओं से रोज दो-चार हो रहा शहर का प्रबुद्ध वर्ग मानता है कि शहर की सरकार अब दिल्ली से भी दूर लगने लगी है, क्योंकि शिकायत पर सुनवाई ही नहीं होती।
हालत इतने खराब हो गए हैं कि पार्षद का संवाद पड़ोसी तक और महापौर का संवाद मोहल्ले तक सीमित रहा गया है। नगर निगम चुनाव को 15 दिन बाकी हैं और अब वक्त आ गया है कि हम अपने जनप्रतिनिधि का चुनाव करें। शनिवार को ‘अमर उजाला’ कार्यालय में आयोजित संवाद कार्यक्रम में शामिल शिक्षकों ने इस बात पर जोर दिया कि अब जाति, धर्म, पार्टी से ऊपर उठकर पार्षद और महापौर का चुनाव करना होगा। शहर की जनता को ऐसा नेतृत्व चुनना होगा, जिसके पास अगले पांच साल का विजन हो, समस्याओं के निराकरण के लिए मौके पर संघर्ष करने को तैयार रहे और अपने घर, रिश्तेदार, पड़ोसी से अलग अलग हटकर मोहल्ले एवं शहर के विकास के लिए काम करें।
‘मुझे शहर में रहते 40 वर्ष बीत गए। पहले शहर शांत था, सड़कें चौड़ी थीं, ट्रैफिक बहुत कम था। अब ये सभी चीजें संकुचित होने लगी हैं। शहर का विस्तार नहीं हो रहा। शहर को गंगा-यमुना के पार बसाए जाने की भी जरूरत है। इसके लिए लंबी प्लानिंग की जरूरत है। यह किसी एक मेयर के वश की बात नहीं है लेकिन किसी को शुरुआत तो करनी होगी और क्रमबद्ध विकास के तहत शहर का विस्तार करना होगा। सरकार को भी स्वायत्तशासी संस्थाओं के अधिकार बढ़ाने होंगे ताकि वे बेरोकटोक अपनी कर्तव्यों का पालन कर सकें।’ प्रो. हर्ष कुमार, डीएसडब्लयू, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
‘हमें देखना होगा कि पार्षद या महापौर का चुनाव लड़ने वाले नगर का विकास करना चाहते हैं या केवल अपना। कहीं उनका लक्ष्य केवल कुर्सी या सत्ता तक पहुंचना तो नहीं है। सिर्फ सरकार का विरोध या समर्थन के लिए चुनाव लड़ने वाले नेता मुहल्लों और शहर का विकास नहीं कर सकते। हमें ऐसे लोगों को पहचाना होगा। विदेशियों की कल्पना भर से शहर स्मार्ट नहीं बनेगा। इसके लिए योग्य पार्षद और महापौर का चुनाव जरूरी है। हमें ऐसे जनप्रतिनिधि को चुनना होगा, जो ट्रैफिक, सफाई, अतिक्रमण जैसी समस्याओं का निराकरण करे। ऐसा हुआ तो शहर खुद-ब-खुद स्मार्ट हो जाएगा।’ प्रो. राम सेवक दुबे, चीफ प्रॉक्टर, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
‘हमारा पार्षद और महापौर ऐसा होना चाहिए, जो शहर को स्वच्छ बनाने और इसके धार्मिक एवं सांस्कृतिक पक्ष को उभारने का काम करे। साथ ही सभी विभागों से तालमेल बनाकर चले। अब तक इसकी कमी बनी हुई है। उदाहरण के तौर पर सीएमपी डिग्री कॉलेेज और जॉर्जटाउन में जलभराव की समस्या है। कागज में सीएमपी के पीछे वाला नाला जवाहर लाल नेहरू रोड वाले नाले से जोड़ दिया गया लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं हुआ। हर साल जल भराव पर छात्र आंदोलन करते हैं, दो-दो माह कक्षाएं नहीं चल पातीं। नगर निगम को दर्जनों पत्र लिखे गई लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।’ डॉ. सुनील कांत मिश्र, सीएमपी में शिक्षक एवं ऑक्टा अध्यक्ष
‘मैं कई वर्षों से कालिंदीपुरम में रह रहा हूं। घर के पास ही डंपिंग ग्राउंड है। गंदगी बजाबजाती रहती है। नगर निगम से लेकर सीएम पोर्टल तक शिकायत दर्ज कराई। छह माह में एक बार सफाई हो पाती है। सुबह घर से कॉलेज के लिए निकलता हूं तो मुंह पर रुमाल बांधकर जाना पड़ता है। जगह-जगह सड़क किनारे गंदगी का अंबार लगा रहता है। खुले वाहनों में कूड़े का ढोया जाता है। सुबह 10 से दोपहर दो बजे तक सड़कों पर काफी भीड़ होती है। कूड़ा सुबह आठ बजे से पहले उठ जाना चाहिए। पार्षद हो या महापौर, उसे स्वच्छता पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।’ डॉ. उमेश प्रताप सिंह, ईसीसी में शिक्षक एवं ऑक्टा के महासचिव
‘सबसे जरूरी कूड़ा प्रबंधन है। लोगों को इस बारे में जागरूक करने की जरूरत है। इस पर पार्षदों और महापौर को काम करने की जरूरत है। उनका जनता से सीधा संपर्क होता है। जनता के बीच जाकर बताना चाहए कि वेस्ट मैनेजमेंट के लिए क्या उपाय करें, क्योंकि सीधा संबंध शहरियों के स्वास्थ्य से हैं। मैं मम्फोर्डगंज में रहता हूं। वहां कई जगह कूड़े का ढेर लगा रहता है। इसके साथ ही शहर में जगह-जगह पौधरोपण और सुंदरीकरण काम भी होना चाहिए। इसके लिए किसी विशेष अवसर का इंतजार करने की जरूरत नहीं। ये काम साल भर होने चाहिए।’ डॉ. मुनीश, शिक्षक, बायोकेमेस्ट्री विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
‘नगर निगम की कर प्रणाली में सुधार की जरूरत है। जहां चाहा गृह कर, जल कर, सीवर कर बढ़ा दिया और जहां चाहा कम कर दिया। कर प्रणाली ठीक न होने के कारण भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है और इसका नुकसान शहर के नागरिकों को उठाना पड़ रहा है। कर निर्धारण प्रणाली पर मॉनीटरिंग होनी चाहिए। पार्षदों और महापौर को इस पर ध्यान देने की जरूरत है। इसके अलावा हमें ऐसा पार्षद और महापौर चुनना चाहिए जो नागरिकों को अतिक्रमण करने से रोके, न कि खुद सत्ता में आने के बाद घर के सामने चबूतरा बनाकर कब्जा करे।’ डॉ. अविनाश श्रीवास्तव, शिक्षक, कॉमर्स विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
‘शिक्षा ही किसी समाज के विकास का मूल आधार है। पहले नगर निगम के स्कूल हुआ करते थे, जो अब नहीं हैं। इन्हें फिर से खोले जाने की जरूरत है। यह भी देखा जाता है कि नगर निगम शिक्षण संस्थानों के आसपास ही कूड़ा अड्डा बना देता है। इस पर सख्ती से लगाम लगाने की जरूरत है लेकिन चुनाव जीतने के बाद पार्षदों और महापौर के लिए यह मुद्दा महत्वहीन हो जाता है। इसके अलावा आवारा पशुओं के रोकथाम के लिए भी निगम को गंभीरता से काम करने की जरूरत है।’ डॉ. हरबंस सिंह, शिक्षक, विधि विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
‘छोटा-छोटा सुधार ही बड़े सुधार की वजह बनता है। वार्ड स्तर पर इकाई सुद़ढ़ होगी तो हमें महापौर के पास भी जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। नगर निगम चुनाव को भी बेहद गंभीरता से लेना चाहिए। हमें इस बात को समझना होगा कि नगर निगम को करोड़ों, अरबों का बजट मिलने के बाद भी हम लगातार पीछे क्यों जा रहे हैं। हमें योग्य पार्षद और महापौर का चुनाव करना ही होगा। अगर हम जाति, धर्म या दल के चक्कर में पड़कर गलत सुधार करते हैं तो अपनी समस्याओं के लिए हम खुद जिम्मेदार हैं।’ डॉ. बृजेंद्र सिंह, शिक्षक नेता, इलाहाबाद राज्य विश्वविद्यालय
‘पुराने शहर के वार्डों में कूड़े का अंबार लगा रहता है। शहर भर में मच्छरों का प्रकोप है लेकिन फॉगिंग नहीं कराई जाती। सभी को अपने पार्षद और महापौर से उम्मीद होती है कि उनके माध्यम से इन समस्याओं का समाधान होगा। शहर में समस्याओं को अंबार है और जनता भटक रही है लेकिन कोई सुनने वाला नहीं। पार्षद हों या महापौर, उनसे मुलाकात कर पाना मुश्किल है। पार्षद या महापौर ऐसा व्यक्ति बने, जो पढ़ा-लिखा, मिलनसार और समझदार हो।’ देवेंद्र श्रीवास्तव, जिलाध्यक्ष प्राथमिक शिक्षक संघ
‘नगर निगम की सीमा पर बसे मुहल्लों में साफ-सफाई, नाली, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं पर निगम कोई ध्यान नहीं देता है। कई नगर प्रमुख और महापौर आए लेकिन उनका निरीक्षण और सुधार का प्रयास भी गिने-चुने मुहल्लों तक सीमित रहा गया। मुंडेरा, नैनी, फाफामऊ जैसे इलाके, जहां नगर निगम के वार्ड हैं, वहां मूलभूत सुविधाओं के लिए नागरिक तरस रहे हैं। पार्षद भी यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि उनकी कोई नहीं सुनता। पार्षदों के अधिकार को भी विस्तार देने की जरूरत है।’ डॉ. बीएल पाल, प्रांतीय वरिष्ठ विधि मंत्री, राजकीय शिक्षक संघ
‘शहर में हर साल माघ मेला होता है। छह साल पर कुंभ और अर्धकुंभ का आयोजन किया जाता है। इसके लिए अरबों रुपये का बजट आता है। अगर यहां कुंभ और महाकुंभ न होता तो हालात और अधिक बदतर होते। हमें इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। देखना चाहिए कि इस बजट से इतर पार्षद या महापौर ने अपने प्रयास से मुहल्लों और शहर में कितना काम कराया, तभी उनका सही तरीके से मूल्यांकन हो सकेगा और हम सही जनप्रतिनिधि का चुनाव कर सकेंगे।’ चिंतामणि त्रिपाठी, जिला मंत्री, प्राथमिक शिक्षक संघ
‘मैं खुल्दाबाद में रहता हूं। वहां नगर निगम को एक अस्पताल हुआ करता था। बचपना याद आता है, जब खेलते-कूदते कहीं गिर गए और चोट लग गई तो उसी अस्पताल में जाकर दवा- पट्टी करा लेते थे। अस्पताल की जगह अब निगम का कर कार्यालय खुल गया है। नगर निगम में अब एलोपैथिक का कोई डॉक्टर तक नहीं है। केवल होमियोपैथिक के डॉक्टर हैं। पार्षदों और महापौर को प्रयास करना चाहिए कि हर वार्ड में एक डिस्पेंसरी खुले, जहां मुहल्ले के लोगों को मुफ्त या बहुत सस्ता इलाज मिले।’ हरित कुमार जेदली, मीडिया प्रभारी, उत्तर प्रदेश प्राथमिक शिक्षक संघ
‘हमें हर समस्या के निराकरण के लिए सरकार या नगर निगम पर निर्भर नहीं होना चाहिए। कम से कम साफ-सफाई के क्षेत्र में हमें खुद अपनी भूमिका भी तय करनी चाहिए। कूड़ा इधर-उधर नहीं फेंकना चाहिए। साथ ही पार्षदों और महापौर पर भी सफाई व्यवस्था को बेहतर करने के लिए दबाव बनाना चाहिए। हालांकि इससे जनप्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। उन्हें भी अपने कर्तव्य को समझना होगा। चुनाव जीतने का मतलब सिर्फ नेता बनना नहीं, बल्कि जनता की समस्या को दूर करना है।’ मनोज कुमार गुप्ता, संगीताचार्य, रानी रेवती देवी सरस्वती विद्या निकेतन
‘स्वच्छ भारत अभियान का असर वार्ड स्तर पर भी दिखना चाहिए। इसके लिए मुहल्ले के लोगों को आगे आना होगा लेकिन सफलता तभी मिलेगी जब पार्षद और महापौर पहल करेंगे। मैं दारागंज में रहती हूं और कुछ दूरी पर संगम है। मुहल्ले और संगम क्षेत्र के आसपास जबर्दस्त गंदगी है। जगह-जगह कूड़े अंबार लगा रहता है। चुनाव से पहले पार्षद और महापौर पद के प्रत्याशी मुहल्ले को चमकाने का दावा करते हैं और चुनाव जीतते ही गायब हो जाते हैं। हमें अपना जनप्रतिनिधि सोच-समझकर चुनने की जरूरत है।’ श्वेता शर्मा, शिक्षक, वाणिज्य प्रवक्ता, रानी रेवती देवी सरस्वती विद्या निकेतन
‘नगर निगम जैसे छोटे चुनावों में राजनीति दलों को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। यह मुहल्ले और शहर का चुनाव है। हमें अपने क्षेत्र के पार्षद और शहर के महापौर का मूल्यांकन स्वयं करना चाहिए। इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि किसी समस्या के लिए पार्षद या महापौर के पास कितनी बार गए और समस्या का कितना समाधान हुआ। सिर्फ इसलिए किसी को चुनने की जरूरत हैं कि वह किसी दल या संगठन से ताल्लुक रखता है।’ अनूप सिंह, शिक्षक, सामाजिक विज्ञान, रानी रेवती देवी सरस्वती विद्या निकेतन
‘सिर्फ कूड़ा उठाकर फेंक देने या साल में एक बार नाला साफ कर देने से स्वच्छता नहीं होती। इसके लिए व्यापक प्रचार-प्रसार की भी जरूरत है। नगर निगम को चाहिए कि वार्ड स्तर पर इसका प्रचार-प्रसार करे। यह काम पार्षद ही बेहतर ढंग से कर सकते हैं। पार्षद का सिर्फ इतना ही नहीं है कि लोगों से आवेदन लेकर निगम प्रशासन के अफसरों तक पहुंचा दे। हमें ऐसा पार्षद चुनने की जरूरत है जो मुहल्ले के लोगों को स्वच्छता एवं नगर निगम से मिलने वाली सुविधाओं के प्रति नगारिकों को जागरूक करे।’ अजय सिंह चंदेल, शिक्षक, गणित, रानी रेवती देवी सरस्वती विद्या निकेतन