सरकार ने न्याय व्यवस्था को पंगु बना दिया : हाईकोर्ट
शिक्षा अधिकरण के मुद्दे पर की सख्त टिप्पणी, सरकार का निर्णय सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विपरीत
अमर उजाला ब्यूरो
सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि जहां हाईकोर्ट हो, वही पर अधिकरण गठित होने चाहिए। इससे न्यायिक परिवीक्षा हो सकेगी। इसके बावजूद राज्य सरकार ने शिक्षा सेवा अधिकरण लखनऊ में स्थापित करने का कानून पास कर राष्ट्रपति के समक्ष भेज दिया है। अभी यह कानून नहीं बन सका है ऐसे में कोर्ट इसकी वैधता पर विचार नहीं कर रही। कोर्ट ने कहा सरकार के इस कदम ने हाईकोर्ट की न्याय व्यवस्था को पंगु कर दिया है। जब की सरकार पर त्वरित न्याय दिलाने की जवाबदेही है। कोर्ट ने कहा है कि राज्य पुनर्गठन अधिनियम 2000 में स्पष्ट है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट उत्तर प्रदेश का हाईकोर्ट है। इसके बावजूद एक खंडपीठ ने कहा कि प्रदेश में कोई प्रधान पीठ नहीं है। दो पीठ इलाहाबाद और लखनऊ में हैं। हालांकि इस फैसले को दूसरी खंडपीठ ने कानून के विपरीत करार देते हुए निरर्थक करार दिया है।
सरकार बताए अपनी नीति
कोर्ट ने प्रमुख सचिव माध्यमिक और बेसिक एवं प्रमुख सचिव विधि एवं न्याय को नोटिस जारी कर पूछा है कि वादकारियों को नजदीक या केंद्रीकृत न्याय देने की सरकार की क्या नीति है। और कोर्ट के फैसलों के विपरीत निर्णय लेकर उसने न्यायिक कार्य को बाधित क्यों किया है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा वकीलों की हड़ताल को अवैध करार देने के फैसले को दुहराते हुए इसे वादकारी हितों के विपरीत करार दिया है। कोर्ट ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विपरीत राज्य सरकार ने प्रदेश में एक स्थान पर शिक्षा सेवा अधिकरण के गठन का फैसला लेकर न्यायिक कार्य में अवरोध उत्पन्न किया। जिससे वादकारियों को न्याय देने की कार्यवाही बुरी तरह बाधित हुई है। कोर्ट ने राज्य सरकार से प्रदेश में ऐसी स्थिति पैदा करने की सफाई मांगी है।
वकीलों को नहीं है हड़ताल का अधिकार
वकीलों की हड़ताल पर कोर्ट ने कहा कि वादकारी वकालतनामा मुकदमे में बहस के लिए देता है ।इसकी शर्तों के विपरीत वकीलों को न्यायिक कार्य बहिष्कार का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा है कि जब तक अधिकरण गठन के मुद्दे पर कोर्ट का फैसला नहीं आ जाता, वकील काम पर लौट आएं। हड़ताल से जेलों में बंद लोगों को न्याय नहीं मिल पा रहा है।