सती की देह से जुड़ी है शक्तिपीठ की पौराणिक मान्यता
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, दक्ष यज्ञ में माता सती के देह त्याग के बाद भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर शोकाकुल अवस्था में विचरण करने लगे। सृष्टि के संतुलन की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को खंडित किया। मान्यता है कि इसी स्थान पर माता सती का एक अंग अदृश्य हो गया था। इसी घटना से इस स्थान का नाम अलोप शंकरी पड़ा। माता सती की स्मृति और आदिशक्ति की महिमा से जुड़ी यह मान्यता मंदिर की धार्मिक प्रतिष्ठा को विशिष्ट बनाती है। श्रद्धालु यहां दर्शन कर स्वयं को देवी की कृपा और शक्ति से जुड़ा अनुभव करते हैं।
रक्षासूत्र बांधकर मनोकामना मांगते हैं भक्त
मां अलोप शंकरी के दरबार में मनोकामना पूर्ति की आस्था भी गहराई से जुड़ी है। श्रद्धालु मंदिर में रक्षासूत्र बांधकर मां से अपनी मनोकामनाएं पूर्ण करने की प्रार्थना करते हैं। यहां मुंडन संस्कार सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान भी संपन्न कराए जाते हैं। सोमवार, शुक्रवार और नवरात्रि जैसे विशेष अवसरों पर मंदिर में भक्तों की भीड़ बढ़ जाती है।
जयकारों से गूंजा मंदिर परिसर, भक्ति में डूबी संगम नगरी
शारदीय नवरात्रि के पहले दिन अलोप शंकरी मंदिर में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ ने संगम नगरी की गहरी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपरा की झलक पेश की। मां के दर्शन की अभिलाषा लेकर पहुंचे भक्तों के बीच उत्साह और श्रद्धा का संगम दिखाई दिया। देवी के जयकारों और पूजा-अर्चना के बीच नवरात्रि के नौ दिनों तक चलने वाली शक्ति साधना का शुभारंभ भक्तिमय वातावरण में हुआ।