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देव असीस सुरुजदेव रखली बरत तोहार

Tue, 13 Nov 2018 01:32 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, प्रयागराज
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प्रयागराज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो,प्रयागराज
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‘अन्न दिहले, धन दिहले, वंश बढ़इले ना, बबुआ होई हमके त छठ करबो ना’ की कामना और संकल्प के साथ सोमवार को ‘खरना’ के साथ छत्तीस घंटे का निर्जल व्रत आरंभ हुआ। बेटे की मंगलकामना के लिए रखे जाने वाले सूर्योपासना के चार दिनी डाला छठ या सूर्यषष्ठी व्रत के दूसरे दिन व्रती महिलाओं में व्रत के बावजूद जबर्दस्त उत्साह रहा। ‘खरना’ का पूरा दिन ही पूजा अनुष्ठान की तैयारियों के नाम रहा। छठपर्व के गीतों के बीच व्रती महिलाओं ने यमुना, संगम सहित गंगा के विभिन्न घाटों पर डुबकी लगाई।
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दिन भर के निर्जला व्रत के बाद मिटटी के नए चूल्हे पर शाम को दूध-गुड़ से बनी अरवा चावल की खीर खाकर व्रत खोला। एक समय का भोजन किया और मन की शुद्धि के साथ छत्तीस घंटे के निर्जला व्रत का संकल्प लिया। अपनी परंपरानुसार कई घरों में खीर के लिए खांड का भी इस्तेमाल किया गया। गुड़ से ही ठोकवा-गुलगुला भी बनाया गया।  इससे पहले ‘खरना’ की थाली में सिंदूर और घी मिलाकर सूर्यचक्र बनाया और मिट्टी के दीये पर प्रसाद रखा गया। कलश पर धूप, दीप और मीठी चीज रखी गई, फिर सिंदूर लगाया गया।

दिन भर के व्रत के बाद शाम को परिवार की परंपरानुसार कुलदेवता की पूजा की गई। कुलदेवता, सूर्य देव और छठ मैया को गुड़ से बनी खीर का नैवेद्य अर्पित करके उनकी पूजा की गई। फिर व्रती महिलाओं ने प्रसाद ग्रहण किया। उन्होंने दूध-गुड़ से बनी अरवा चावल की खीर खाई और पंचमी का चांद नजर आने तक पानी पिया। पर्व के निमित्त अनेक परिवारों में छठ के गीतों के साथ रात्रि जागरण भी किया गया।
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व्रती महिलाओं में उल्लास ऐसा रहा कि उन्होंने नई नवेली दुल्हन जैसा ही शृंगार किया, साथ ही मांगलिक अवसरों की परंपरा के मुताबिक ‘नाक से माथे’ तक सिंदूर भी लगाया। पर्व के उत्साह ने उनका मनोबल बनाए रखा। रविवार को ‘नहाय-खाय’ से सूर्यषष्ठी उत्सव आरंभ हुआ था।

छठ की दस्तक के साथ ही छठ के मंगलगीत भी घर से लेकर घाट तक गूंजे। रात्रि जागरण में भी गीत गाए गए। ‘कांच ही बांस की बहंगिया, बहंगी लचकत जाए/बात जो पूछेला बटोहिया, ई बहंगी केकरा के जाय/आन्हर होइबे रे बटोहिया ई बहंगी आदितमल जाय’, हो दीनानाथ, पहिले पहिल हम कइली छठी मइया बरत तोहार, जैसे गीत चर्चा में रहे।

मंगलवार को अर्घ्य देने के लिए सोमवार को भी पूजा सामग्री से सूप या डाला सजाया गया। बांस के सूप में सजाने के लिए शरीफा, मुसम्मी, कन्ना, गन्ना, मूली, गाजर, नीबू, नारियल, पत्ते वाली हल्दी, कद्दू, गाजर, अदरक आदि खरीदा गया। पर्व के मद्देनजर अबकी सभी चीजों के दाम बीते वर्ष की अपेक्षा डेढ़ से दोगुने तक रहे।

छठ पर मंगलवार को बलुआघाट, संगम सहित गंगा के विभिन्न घाटों पर कमर भर पानी में खड़ी होकर व्रती महिलाएं डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देंगी। परंपरानुसार पीले कपड़े पहनकर घर से घाट तक का सफर पूरा करेंगी। सजे सूप के अगले भाग में जलता हुआ मिट्टी का दीया रखा जाएगा। अगले दिन बुधवार को उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के बाद कोई मीठी चीज खाकर व्रत का पारण होगा।
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