इम्तियाज गाजी की शायरी में उनकी मिट्टी की महक आती है। इसलिए वो लोगों के दिल में उतर जाते हैं। उनकी शायरी में बेबाकी और सच्चाई कूट-कूटकर भरी है। आज ऐसी ही शायरी की जरूरत है। शनिवार को यह बातें मशहूर फिल्म अभिनेत्री शबाना आजमी ने गुफ़्तगू की ओर से आयोजित ऑनलाइन परिचर्चा में कहीं। मशहूर साहित्यकार ममता कालिया ने कहा कि इम्तियाज गाजी के पास कुछ यादगार नज्में और गजलें हैं। वे वक़्त की तल्खियों को परे सरका कर, अमन और सुकून के साथ और मुहब्बत की बात करते हैं। ‘इस जहां में सभी मुसाफिर हैं/सौ बरस का सामान है फिर भी।‘ या ‘आज साहिल पे इतनी खुशबू है/कोई चेहरे को मल रहा है क्या।’ जैसे अशआर जेहन में देर तक बने रहते हैं। अपनी शायरी में गाजी महसूस करते हैं कि-‘तुम जिसे जिन्दगी नहीं कहते/हम उसे मौत भी नहीं कहते।’ इम्तियाज एक मुश्किल समय का न सिफ़ॱर सामना करते हैं वरन उसे आसान बनाने के लिए लिखते हैं। गीतकार यश मालवीय के मुताबिक ग़ाजी हिंदुस्तानी ग़जल का एक कीमती नगीना हैं। उनका अंदाजे गुफ़्तगू ग़जल के तमाम शायरों के बीच अलहदा नजर आता है। फिल्म स्टोरी राइटर संजय मासूम ने कहा कि इम्तियाज ग़ाजी अपनी धुन के पक्के इंसान हैं। ग़जलकार विज्ञान व्रत के अलावा लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, संजय सक्सेना, अतिया नूर, रचना सक्सेना, डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’, नीना मोहन श्रीवास्तव, शैलेन्द्र जय, सुमन ढींगरा दुग्गल, मनमोहन सिंह तन्हा, अना इलाहाबादी, प्रभाशंकर शर्मा, अनिल मानव, रमोला रूथ लाल ‘आरजू’, डॉ. ममता सरूनाथ, शगुफ़्ता रहमान, ऋतंधरा मिश्रा, दयाशंकर प्रसाद, डॉ. नरेश कुमार ‘सागर’, इसरार अहमद, विजय प्रताप सिंह, जमादार धीरज, शैलेंद्र कपिल, मासूम रजा राशदी, सागर होशियारपुरी, अर्चना जायसवाल, डॉ. नीलिमा मिश्रा, सम्पदा मिश्रा और प्रिया श्रीवास्तव ने भी विचार व्यक्त किए। रविवार को अतिया नूर के ग़जल संग्रह ‘पत्थर के आंसू’ पर परिचर्चा होगी।