क्षेत्र के मिर्जापुरा राजमार्ग पर स्थित जीईटी एंड डी इंडिया लिमिटेड कंपनी (जीसी कंपनी) बिक गई है। आंध्र प्रदेश की सिरडी साईं इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड ने इस कंपनी को 25 करोड़ रुपये में खरीदा है। इसकी जानकारी जब मंगलवार को यूनियन के पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों को हुई तो सारे कर्मचारी मुख्य गेट के बाहर धरने पर बैठ गए और मालिकानों पर चोरी छिपे कंपनी को बेचकर भाग जाने का आरोप लगाते हुए नारेबाजी करने लगे। पता चलने पर इलाकाई पुलिस के अलावा उपश्रमायुक्त मौके पर पहुंचे। देर शाम उपश्रमायुक्त ने मैनेजमेंट से बातचीत की। उपश्रमायुक्त के आश्वासन पर धरना प्रदर्शन खत्म हुआ।
कर्मचारी यूनियन के मंत्री सुभाष चंद्र भारती, अध्यक्ष अनिल कुमार, संयुक्त मंत्री प्रताप नारायण मंगलम, उपाध्यक्ष आलोक तिवारी एवं रामकृष्ण पांडेय उर्फ मुन्ना पांडेय आदि का आरोप है कि कंपनी को मालिकानों ने गोपनीय तरीके से बेच दिया। उसमें यूनियन को न तो बताया गया और न ही सहमति ली गई। यह भी आरोप है कि जिस कंपनी को इस कंपनी को बेचा गया है, उसका सालाना टर्न ओवर ही मात्र 50 से 60 करोड़ रुपये हैं, जितना इस कंपनी का सालाना खर्च है।
दोपहर एक बजे से धरने पर बैठे यूनियन पदाधिकारियों ने आरोप लगाया कि सोमवार को जब वह मैनेजिंग डायरेक्टर के पास नए वर्ष का तोहफा मांगने गए तब बताया गया कि कंपनी बिक गई। इस पर जब नाराजगी जताई गई तो एमडी ने कहा कि कर्मचारी यूनियन को बताना उचित नहीं समझा। इसी बात से नाराज यूनियन के लोगों ने मंगलवार को धरना प्रदर्शन किया। इसे लेकर कई बार नोक झोक हुई। शाम को उपश्रमायुक्त राकेश द्विवेदी व पुलिस पहुंची। उन्होंने मालिकानों से बात की। उसके बाद कर्मचारियों को समझाया, तब जाकर शाम को 6.30 बजे धरना प्रदर्शन खत्म हुआ।
कंपनी के 631 कर्मचारियों को सताने लगा बेरोजगारी का डर
नैनी। क्षेत्र मिर्जापुर रोड पर स्थित जीईटी एडं डी इंडिया लिमिटेड कंपनी सबसे बड़ी ट्रांसफार्मर बनाने वाली कंपनी है। अब तक यह कई बार बिक चुकी है। वर्तमान मालिकान भी इसे बंद करने की काफी दिनों से तैयारी कर रहे थे, लेकिन यूनियन और राजनैतिक दबाव की वजह से वह पीछे हटते रहे थे। हालांकि, इन दबावों के बावजूद अब कंपनी बिक गई है। सोमवार को इस पर मुहर भी लग गई। ऐसे में कंपनी में नियुक्त 231 स्थाई एवं करीब 400 अस्थाई कर्मचारियों के सामने नौकरी तथा रोजी रोटी का संकट मंडरा रहा है। यहां के इन करीब 631 कर्मचारियों को डर है कि अगर नई कंपनी ने उन्हें निकाल दिया गया तो वह आखिर कहां जायेंगे।
इस संबंध में गत 13 नंवबर को सांसद डा. रीता बहुगुणा जोशी के साथ यूनियन के पदाधिकारियों ने औद्योगिक विकास मंत्री सतीश महाना के साथ बैठक की थी। जिसमें मैनेजिंग डायरेक्टर अजय जैन, एचआर हेड सुरजीत मुखर्जी आदि भी शामिल हुए थे। जिसमें कर्मचारी संघ का कहना था कि कंपनी को बंद न होने दिया जाए। जीईटी कंपनी इस यूनिट को चलाएं या किसी अच्छी कंपनी में विलय करा दें। जिससे कर्मचारियों को बेरोजगार होने से और औद्योगिक क्षति के साथ ही क्षेत्र के विकास को प्रभावित होने से रोका जा सके। जिस पर प्रबंधन पक्ष ने कंपनी को अच्छी कंपनी में विलय करने की बात को स्वीकार किया था।
इसके साथ ही अगले 45 दिन में किसी अच्छे क्रेता को ढूंढकर लाने का आश्वासन दिया था। इसके विपरीत यूनियन पदाधिकारियों का आरोप है कि मालिकानों ने बिना उनकी सहमति के एक ऐसी कंपनी को जीईटी को बेच दिया, जो छह महीने से ज्यादा नहीं चल सकती। हमारी मांग थी कि किसी बड़े ब्रांड को कंपनी को बेचा जाए, ताकि वह कंपनी चला सके। आरोप लगाया गया कि जिस कंपनी का सालाना टर्नओवर 800 से 900 करोड़ रुपये रहा हो, उसे मात्र 25 करोड़ में बेचना मालिकानों की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करता है।
कंपनी के मैनेजमेंट से बातचीत हो गई है। नई कंपनी ने सभी कर्मचारियों को पुरानी सेवा शर्त के आधार पर ही नौकरी पर रखने का आश्वासन दिया है। समझौते में भी इसका उल्लेख होने की बात बताई गई है। क्र्रेता और विक्रेता दोनों कंपनियों के मालिकानों को यूनियन पदाधिकारियों के साथ बैठक कर मामला सुलझाने को कहा गया है। इसके लिए 28 दिसंबर को शाम चार बजे उपश्रमायुक्त कार्यालय में बैठक होगी। जिसमें सभी की बात सुनकर एक हल निकाला जाएगा।
राकेश द्विवेदी, उपश्रमायुक्त, प्रयागराज।
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