आधुनिकता और काल्पनिकता की अंधी दौड़ के बीच भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अमर नाथ झा छात्रावास के छात्रों ने विलुप्त होती लोक संस्कृति को बचाने की बीड़ा उठाया है। छात्रावास के छात्रों की ओर से आयोजित ऋतु सावन के कार्यक्रम में लोकगीतों के कार्यक्रम में एक से बढ़कर एक प्रस्तुति से गायक-गायिकाओं ने युवाओं को थिरकने को मजबूर कर दिया। कार्यक्रम का आकर्षण पूर्वांचल विवि के कुलपति प्रो. राजाराम यादव रहे, उन्होंने छात्रों के बीच कजरी गाकर सबकी वाहवाही पाई।
कार्यक्रम ऋतु सावन में आकशवाणी की लोक गायिका प्रियंका चौहान की कजरी पर छात्रावास के छात्रों के साथ इविवि के दूसरे छात्रावासों के छात्रों ने खूब मनोरंजन किया। इस दौरान एक के बाद एक कजरी, चैती, सोहर की प्रस्तुति के बीच छात्र झूमते रहे। लोकगीतों की प्रस्तुति विवेक रंजन सिंह के निर्देशन में किया गया। गीतों में सावन की फुहार सहित ऋतुओं की भी झलक दिखी। ‘चला देखि आई नन्द के किशोर सखी’ और ‘श्याम बचपन में बनके बकइयां चले’ में कृष्ण के बचपन की झलक दिखी। ‘हरे रामा रिमझिम से बरसेला पनिया’ कजरी से रिमझिम बारिश की फुहार। ‘चैत मास बोली रे कोयलिया’ से चैत्र मास में नायिका की व्यथा दिखी। ‘पहिला जे बाण रामा मारै हरिनिया उठि बैठे हो’ से सामंतवादी सत्ता की झलक दिखी। विवेक के तैयार गीतों में भाव के साथ साथ प्रतिरोध से भी भरे गीत प्रस्तुत किए गए। लोकसंस्कृति को बचाने केलिए आयोजित कार्यक्रम ऋतु सावन का संयोजन युवा शोधार्थी धीरेंद्र प्रताप सिंह ने किया। संयोजक धीरेंद्र ने कहा कि कार्यक्रम का उद्देश्य आज के व्यस्त जीवन में लोगों को अपने गांव और देश की संस्कृति से जोड़े रहना है। उनका कहना था कि लोक कलाओं को लेकर बात तो बहुत होती है पर उसे जमीन पर लाने में लोग शर्म और पिछड़ा महसूस करते हैं।