कानूनी दांवपेच में हो गए थे बरी
जानकारों का कहना है कि तब चारों कानूनी दांवपेच का सहारा लेकर कोर्ट से बरी हो गए थे। दरअसल, आबिद के बारे में उमेश ने एफआईआर में बताया था कि आबिद उसे जान से मारने की धमकी दे रहा है। हालांकि, घटना में उसकी और कोई भूमिका का जिक्र नहीं किया गया।
जिस समय यह घटना हुई थी तब आबिद जेल में था। उमेश ने कोर्ट में बताया था कि आबिद व अशरफ उसे जेल से धमकाते थे। उनके आदमी घर आते थे और धमकी देकर चले जाते थे। तीन से चार बार ऐसा हुआ। घर आकर धमकी देने वाले कौन थे, पुलिस इसका पता नहीं लगा पाई। जेल में आबिद से इस घटना का कोई सह अभियुक्त मिला था, इसका भी कोई साक्ष्य अभियोजन पेश नहीं कर पाया। जेल में आबिद से मौके पर मौजूद रहे किसी अभियुक्त के बीच वार्तालाप हुई हो, इसका भी कोई सबूत पुलिस नहीं ढूंढ़ सकी।
फरहान, जावेद व इसरार के खिलाफ भी नहीं मिला था सुबूत
राजू पाल हत्याकांड में सजा पाने वाले फरहान, जावेद व इसरार समेत पांच उमेश पाल अपहरणकांड में बरी हुए क्योंकि उनके खिलाफ भी पर्याप्त सबूत नहीं ढूंढ़ा जा सका। दरअसल, प्रथम सूचना रिपोर्ट में यह पांचों नामजद नहीं थे। इनके नाम का उल्लेख वादी की ओर से पुलिस के समक्ष व कोर्ट में दर्ज कराए गए बयान में नहीं था। इन पांचों का नाम घटना के चश्मदीद दिलीप पाल ने लिया था।
इसी आधार पर आरोप पत्र में इनका नाम शामिल किया गया था। बयान में दिलीप ने बताया था कि यह पांचों अभियुक्त घटना के दौरान चैलेंजर गाड़ी में मौजूद थे। पुलिस इस चैलेंजर गाड़ी को ही बरामद नहीं कर सकी। उमेश पाल ने भी अपने किसी बयान में इन आरोपियों का नाम नहीं लिया। यही वजह रही कि यह तीनों भी उमेश पाल अपहरण कांड में बरी हुए। हालांकि, राजू पाल हत्याकांड में यह सभी दोषी करार दिए गए।