कथावाचक मोरारी बापू ने पूर्व राष्ट्रपति के साथ अपनी पुरानी स्मृतियों का स्मरण करते हुए कहा कि आपके सानिध्य में बिताए दृश्य अद्भुत और अलौकिक हैं। आज भी मुझे याद है, जब आप गुरुकुल आए थे, सभी व्यवस्थाएं एक ओर थीं, पर आपकी आस्था एक ओर थी। आपने हमारे पूरे गांव को कहा था कि यदि कभी दिल्ली आओ तो कहीं और मत रुकना, राष्ट्रपति भवन में रुकना। इस प्रकार आपने राष्ट्रपति भवन को राष्ट्र भवन के रूप में सभी को दर्शन कराए। उन्होंने कहा कि यह बात और है कि वह खामोश खड़े होते हैं, लेकिन जो बड़े होते हैं, वह बड़े ही होते हैं।
स्वामी चिदानंद सरस्वती ने कहा कि मोरारी बापू सनातन की परम ज्योति हैं, उन्होंने जिसे छू लिया, उसे अपना बना लिया। बापू का जीवन सदैव सेतु निर्माण करता रहा और इसके लिए उन्होंने अनेक संघर्ष झेले, वे अपनी हर श्वास को पूरे विश्वास के साथ जी रहे हैं। कहा कि समुद्र मंथन संग्राम से शुरू हुआ और संगम तक पहुंचा, अमृत तक पहुंचा। बापू का जीवन संग्राम नहीं, संग-राम को चरितार्थ करता है। इस बार का कुंभ ग्लोबल कुंभ बन गया है।
वास्तव में इस बार का कुंभ अद्भुत है। सत्ता से नहीं सत्य से परिवर्तन होता है। यह सृजन से संगम की यात्रा है। अब समय आ गया है कि हमारे दिल और हमारे घर के आगे मोहब्बत लिखा हो। अब समय आ गया है कि हम न बटेंगे, न बाटेंगे, न डरेंगे, न डराएंगे, न कटेंगे, न कटेंगे, न लड़ेंगे, न लड़ाएंगे। यही संगम के तट से संगम का संदेश है, जो हमारे देश के संगम को बचा के रखेगा।