इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मनमुटाव भूलकर विद्यापीठ व कृषि फॉर्म को उच्च स्तरीय शिक्षा संस्थान बनाने का प्रयास करें। आपसी कलह से महत्वपूर्ण उद्देश्य का नुकसान हो रहा है। दोनों संस्थाओं के मिलकर कार्य करने से संस्था के संस्थापक पुरुषोत्तम दास टंडन को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। न्यायालय ने सौ बीघे जमीन के स्वामित्व को लेकर हिंदी विद्यापीठ प्रयाग व हिंदी साहित्य सम्मेलन के बीच चले विवाद की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की पीठ ने हिंदी विद्यापीठ प्रयाग की याचिका निस्तारित करते हुए आयुक्त व राजस्व परिषद का आदेश रद्द कर दिया। साथ ही आयुक्त को निर्देश दिया कि इस अपील का पुन: निर्धारण करें।
याची संस्था हिंदी विद्यापीठ प्रयाग और हिंदी साहित्य सम्मेलन की बीच प्रयागराज के करछना में परगना अरैल, पट्टी उपरहार, मौजा महेवा में सौ बीघे जमीन के स्वामित्व को लेकर विवाद है। आयुक्त प्रयागराज के आदेश हिंदी विद्यापीठ का नाम भूमि के कागज से काटकर हिंदी साहित्य सम्मेलन का नाम चढ़ाने के आदेश को राजस्व परिषद में चुनौती दी। इसे राजस्व परिषद ने खारिज कर दिया तो हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
याची के अधिवक्ता अनिल कुमार मेहरोत्रा ने दलील दी कि हिंदी विद्यापीठ का जमीन पर कब्जा है। यह संस्था स्वतंत्र रूप से संचालित है। संस्था ने अपने व्यय से भूमि का विकास किया। प्रतिवाद संस्था का इस भूमि पर कभी भी किसी तरह का कब्जा नहीं रहा है। यह भूमि हिंदी साहित्य सम्मेलन को उत्तर प्रदेश सरकार ने हिंदी विद्यापीठ स्थापित करने के लिए दिया था। संस्था के स्थापना के बाद वह काबिज है।
वहीं, प्रतिवादी संस्था हिंदी साहित्य सम्मेलन के अधिवक्ता ने दलील दी कि जब भूमि का आवंटन हुआ, उस समय वादी संस्था का कोई वजूद ही नहीं था। ऐसे में संपत्ति पर हिंदी विद्यापीठ प्रयाग का कोई अधिकारी नहीं है। न्यायालय ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि एसडीएम ने भू-राजस्व अधिनियम के अंतर्गत प्रार्थना पत्र को अपोषणीय माना था। इस पर आयुक्त और राजस्व परिषद ने कोई विचार नहीं किया। वादी ने अनेक दस्तावेज संलग्न किए हैं, उन पर भी ध्यान नहीं दिया गया। न्यायालय आयुक्त प्रयागराज को विवेचना को ध्यान रखते हुए अपील पर पुन: निर्धारण शीघ्र करें।