द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों द्वारा इस्तेमाल की गई हवाई पट्टी का वर्षों बाद भारतीय वायु सेना ने इस्तेमाल किया। यह पहला मौका था कि जब यहां भारतीय जवानों ने बड़े एयर क्राफ्ट की सकुशल लैंडिंग कराई। यहां एयरफोर्स ने शुक्रवार को युद्ध की तैयारियों को परखने के लिए चलाए जा रहे युद्धाभ्यास गगन शक्ति के तहत पड़िला हवाई पट्टी पर बचाव कार्य का प्रदर्शन किया। हिंडन एयरबेस दिल्ली से उड़ा सी 130 ग्लोबमास्टर एयरक्राफ्ट यहां सुबह नौ बजे उतरा। महज 30 मिनट के ठहराव में यहां जवानों ने बचाव कार्य की रिहर्सल की।
वायुसेना की ओर से सुबह नौ बजे हवाई पट्टी पर सी-130 एयरक्राफ्ट के लैंड करने की बात कही गई थी। ऐसा हुआ भी। यहां ठीक सुबह नौ बजे सी-130 एयरक्राफ्ट लैंड हुआ। इसके पूर्व रिहर्सल के दौरान दिखाया गया कि घायल सैनिकों का उपचार सेना किस तरह से करती है। हवाई पट्टी के बराबर ही सेना की ओर से लगाए कैंप में 40 जवानों को युद्ध के दौरान अति गंभीर, गंभीर और सामान्य रूप से चोटिल दिखाया गया। जो अलग-अलग कैंप में उपचार पा रहे थे। इस दौरान सी-130 एयरक्राफ्ट के लैंड होते ही जवानों को एंबुलेंस की मदद से हवाई पट्टी पर बारी-बारी से ले जाया गया। वायु सेना के जवानों ने इस रिहर्सल में 19 जवानों को स्ट्रेचर से, एक अति गंभीर घायल को पेशेंट ट्रांसफर यूनिट से, बाकी 20 को स्ट्रेचर बैरियर की मदद से एयरक्राफ्ट के अंदर पहुंचाया। महज 30 मिनट के भीतर ही सभी जवानों को एयरक्राफ्ट के भीतर पहुंचा दिया गया।
इसके बाद 15 मेडिकल स्टाफ की टीम भी उनके साथ यहां से रवाना हुई। 9.30 बजे एयरक्राफ्ट ने यहां से उड़ान भर ली। मेडिकल टीम का नेतृत्व एयर कमोडोर एस मुखर्जी ने किया। जो सेंट्रल एयर कमांड के प्रिसिंपल मेडिकल ऑफिसर भी है। उनका साथ ग्रुप कैप्टन गणेश एवं विंग कमांडर रश्मि मोरे ने दिया। जबकि ऑपरेशन टीम में एओसी एस श्रीवास्तव के साथ ग्रुप कैप्टन खुशाल व्यास एवं विंग कमांडर वेद प्रकाश मौजूद रहे। इस दौरान इलाहाबाद के मंडलायुक्त डा. आशीष गोयल भी हवाई पट्टी पहुंचे। उन्होंने ने भी सेना के इस ऑपरेशन का जायजा लिया।
भारतीय वायु सेना सी-130 एयरक्राफ्ट का उपयोग बचाव एवं राहत कार्य में ही करती है। पांच वर्ष पूर्व ही यह एयरक्राफ्ट भारतीय वायुसेना में शामिल हुआ था। यह एयरक्राफ्ट 24 टन से ज्यादा वजन उठा सकता है। रक्षा मंत्रालय इलाहाबाद क्षेत्र के पीआरओ विंग कमांडर अरविंद सिन्हा ने बताया कि हवाई पट्टी का वर्षों बाद प्रयोग हुआ है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इसका उपयोग किया गया था। इसके बाद अब वायुसेना ने इसका इस्तेमाल किया है। सी-130 एयरक्राफ्ट की खास बात यह है वह कच्चे रास्ते पर भी उतर सकता है।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान फाफामऊ स्थित हवाई पट्टी का अंग्रेजों ने खूब उपयोग किया था। उस दौरान इस हवाई पट्टी से अगस्त 1942 में तब का विध्वंसक विमान हरिकेन यहीं से उड़ान भरता था। यहां कुल दो रनवे हैं, जो एक दूसरे को क्रास भी करते हैं। इस पूरे अभियान का नेतृत्व कर रहे एयर वाइस मार्शल राजेश इस्सर ने बताया कि एक रनवे की लंबाई छह हजार फीट एवं दूसरे की लंबाई 4850 फीट है। फाइटर प्लेन उतारने के लिए नौ हजार फीट का रनवे होना चाहिए। उन्होंने इस पूरे ऑपरेशन की सफलता पर अपने सभी अफसरों एवं जवानों को बधाई भी दी।
भारतीय वायुसेना की ओर से इन दिनों गगनशक्ति अभ्यास किया जा रहा है। इसका पहला चरण 10 अप्रैल को शुरू हुआ था। इस दौरान वायु सेना के जवानों ने देश के तमाम स्थानों पर अपने पराक्रम व युद्ध कौशल का प्रदर्शन किया। इसके दूसरे चरण में वायुसेना की ओर से राहत एवं बचाव कार्य का रिहर्सल किया गया। इसी कड़ी में फाफामऊ स्थित पड़िला हवाई पट्टी जो वर्षों से वीरान पड़ी थी उसका उपयोग वर्षों बाद वायुसेना ने किया। यहां एयर वाइस मार्शल राजेश इस्सर ने बताया कि राहत एवं बचाव प्रदर्शन के नाट्य रूपातंरण से वायु सेना आपात स्थिति में अपनी तैयारियों को परखना चाहती है।
इलाहाबाद के फाफामऊ से 40 जवानों को लेकर सी-130 एयरक्राफ्ट लखनऊ के अमौसी एयरपोर्ट तक गया। वहां कैंट क्षेत्र स्थित कमांड हास्पिटल से एयरपोर्ट तक जवानों को लाने के लिए ग्रीन कॉरीडोर बनाया गया था। लखनऊ जिला प्रशासन के सहयोग से वायु सेना के अफसरों ने जवानों को एंबुलेंस की मदद से कमांड अस्पताल तक पहुंचाया।
अंग्रेजों के जमाने में बनाई गई इस हवाई पट्टी में आज भी खासा दमखम है। हालांकि शुक्रवार को रिहर्सल के पूर्व वायु सेना की ओर से यहां कुछ स्थानों पर हवाई पट्टी की पैचिंग जरूर करवा दी गई। यहां सैन्य अफसरों ने कहा कि हवाई पट्टी की स्थिति ठीक है। वहीं दूसरी ओर माल ढुलाई एवं यातायात की दृष्टि से भी यह हवाई पट्टी काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। क्योंकि यहां जिस स्थान पर हवाई पट्टी है, वहां पास से ही रेलवे लाइन गुजरी है। इसके अलावा तीन तरफ से सड़क मार्ग भी है। इस्तेमाल न होने से इसकी उपयोगिता साबित नहीं हो पा रही है। इलाहाबाद में इरादतगंज में भी वायु सेना की हवाई पट्टी है। हालांकि वहां पास में ही हाईटेंशन तार गुजरा है। इस वजह से उसका भी उपयोग सेना नहीं कर रही।