प्रदेश सरकार ने मुआवजा वितरण की घोषणा तो कर दी लेकिन किसानों का मुआवजा निर्धारण का फार्र्मूला रास नहीं आया। नुकसान कम हो या ज्यादा, सभी को एक ही तराजू में तौल दिया गया। मुआवजा निर्धारण का फार्मूला ही कुछ ऐसा है कि किसानों को इससे खास फायदा नहीं होने वाला। फार्मूले में इतनी विसंगति है कि बड़ी संख्या में किसानों को बीज की लागत के बराबर भी मुआवजा नहीं मिलेगा।
सरकार ने सिंचित भूमि के लिए प्रति हेक्टेयर 18 हजार और असिंचित भूमि के लिए नौ हजार रुपये मुआवजे का निर्धारण किया है। भूमि सिंचित हो या असिंचित, केंद्र एवं प्रदेश सरकार की ओर से 50-50 फीसदी मुआवजे की रकम दी जाएगी। मुआवजा अधिकतम दो हेक्टेयर खेत के लिए दिया जाएगा। किसी किसान के पास इससे अधिक खेत है तो भी मुआवजा अधिकतम दो हेक्टेयर के हिसाब से ही दिया जाएगा। फसल का न्यूनतम 33 फीसदी हिस्सा भी बर्बाद हुआ है तो किसान मुआवजे का हकदार होगा। यहां तक तो ठीक है लेकिन मुआवजा निर्धारण की एक विसंगति किसानों को रास नहीं आ रही।
वह यह कि अगर दो किसानों के पास एक-एक बीघा खेत है और पहले किसान के खेत में 80 फीसदी फसल बर्बाद हुई जबकि दूसरे के खेत में 35 फीसदी नुकसान हुआ तो भी दोनों को बराबर मुआवजा मिलेगा। मुआवजे के निर्धारण में नुकसान के आंकलन का कोई प्रावधान ही नहीं किया गया। एक विसंगति यह भी है कि किसी किसान ने एक बीघा खेत का आधा हिस्सा ही उत्पादन के लिए इस्तेमाल किया और दूसरे किसान ने पूरे एक बीघा खेत का इस्तेमाल किया तो भी मुआवजा दोनों को बराबर मिलेगा, मुआवजे का निर्धारण खतौनी देखकर किया गया। क्षति का आंकलन करना नहीं था, सो 90 फीसदी इलाकों में लेखपाल मौके पर पहुंचे ही नहीं और खतौनी के आधार पर मुआवजे का निर्धारण कर दिया। किसानों को खुश करने के सिर्फ इतना ही किया गया कि नुकसान दो बिस्वा में हुआ हो या एक बीघा में, किसी भी किसान को मुआवजे की रकम डेढ़ हजार रुपये से कम नहीं मिलेगी। हालांकि इस रकम से नुकसान की लागत तो दूर, लागत की एक चौथाई भरपाई भी नहीं हो सकेगी।