यह आदेश न्यायमूर्ति विक्रम डी.चौहान की एकल पीठ ने निगम कर्मचारी के बेटे रविंद्र नाथ शुक्ला की ओर से दाखिल याचिका पर दिया है। याची के पिता शिखर नाथ शुक्ला कानपुर नगर निगम में कर्मचारी थे। 1980 में उनके निधन के बाद परिवार ने पारिवारिक पेंशन की मांग की। इस पर नगर निगम ने आपत्ति जताई। कहा कि सेवा अभिलेख में अंग्रेजी में दर्ज नाम और आश्रितों की ओर से दिए गए पेंशन के प्रार्थना पत्र में अलग हैं। (दोनों की स्पेलिंग में अंतर है)
आश्रितों ने हलफनामा देकर स्पष्ट किया कि दोनों नाम एक ही व्यक्ति के हैं। याची ही पेंशन का वैध हकदार है। इसके बावजूद विभागीय हठ के कारण परिवार को अदालत की शरण लेनी पड़ी। लंबी अदालती लड़ाई के बाद 17 अक्तूबर 2025 को अदालत ने याचिका मंजूर कर पेंशन देने का आदेश दिया था, फिर भी भुगतान नहीं किया गया। इससे परेशान याची ने 2026 में फिर से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
कोर्ट ने जताई हैरानी
मामले पर हैरानी जताते हुए कोर्ट ने कहा कि जब पहचान साबित करने के लिए हलफनामा और उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जैसे ठोस दस्तावेज उपलब्ध थे तो केवल नाम में एक अक्षर के अंतर के आधार पर मृतक आश्रितों की पेंशन इतने वर्षों तक कैसे रोकी जा सकती है।