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Exclusive : कोरोना संक्रमण काल दवा कंपनियों ने चुपके से बढ़ा दिए जरूरी दवाओं के दाम

Sat, 28 Nov 2020 09:35 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इन दवाओं के बढ़े दाम 
  •  सामान्य तौर पर मौसम बदलने पर मरीजों को दी जाने वाली हल्की और सेफ एंटीबायोटिक एजिथ्रोमाइसिन के तीन गोली के पत्ते की कीमत जुलाई में 30 से 60 रुपये थी। नवंबर माह में इसकी कीमत 60 से 80 रुपये हो गई है। इस दवा के दाम जेनरिक कंपनियों ने भी 20 से 25 फीसदी बढ़ाए हैं। 
  • एंटीबायोटिक डॉक्सीसाइक्लिन 100 एमजी के एक पत्ते की कीमत अगस्त में 74 रुपये थी। नवंबर में यही दस गोली का पत्ता मरीजों को 90 से 95 रुपये तक मिल रहा है। इस दवा के दाम जेनरिक दवा कंपनियों ने भी बढ़ाए हैं। 
  • पेट और गैस के रोगियों को दी जाने वाली पेंटोप्रॉजोल और रेब्रिप्रॉजोल की दस गोलियों के पत्ते की कीमत 120 से 170 रुपये था। अक्तूबर माह से इन दवाओं की कीमत भी फार्मा कंपनियों ने बढ़ा दी है। इसकी मौजूदा कीमत 190 से 215 रुपये तक की गई है। 
  • मानसिक रोगियों को दी जाने वाली दवा एसिलाटोप्रैम 15 गोली की कीमत जुलाई माह में 150 रुपये थी। अब नवंबर महीने में इसकी कीमत बढ़कर 225 से 230 रुपये हो गई है। इसी ग्रुप की तीन अन्य दवाओं की कीमतों में भी 30 से 40 फीसदी वृद्धि हुई है। 
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विस्तार
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कोरोना संक्रमण काल में जरूरी दवाओं के दाम बढ़ाकर फार्मा कंपनियां सरकार के प्रयासों पर पानी फेर रही हैं। लोगों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के दावों के विपरीत फार्मा कंपनियां हर तीसरे महीने दवाओं के 20 से 30 फीसदी चुपके से बढ़ा रही हैं। कुछ खास दवाओं के साथ सस्ती और सुरक्षित मानी जाने वाली एंटीबायोटिक एजिथ्रोमाइसिन और दर्द बुखार में दी जाने वाली निमोलिड के दाम बढ़ने से लोगों की जेब खाली हो रही है। 

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दवा बाजार के जानकारों के मुताबिक दवाओं की मांग बढ़ने के साथ ही फार्मा कंपनियां चुपके से बैच नंबर बदलकर बढ़े दाम के साथ स्टाक भेज देती हैं। दुकानदारों को भी तब पता चलता है, जब उनके पास एनवाइस पहुंचती है। कंपनियों की यह मनमानी दवा कारोबारियों पर ही नहीं मरीजों पर भी भारी पड़ रही है।

प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
दवा कारोबारियों का कहना है कि दवाओं की मांग बढ़ने के साथ उनके दाम कंपनियां बढ़ा रही हैं। मजबूरी में बढ़ी दरों पर बिक्री मजबूरी होती है। थोक कारोबारियों के यहां मेडिकल स्टोर संचालक और फुटकर दवा विक्रेताओं के यहां ग्राहक किचकिच करते हैं। दवा की जरूरत मरीजों को ज्यादा कीमत अदा करने पर मजबूर करती है। 
 

प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

कील-मुंहासों की दवा और एंटी फंगल क्रीम की कीमतों में भी उछाल

कोरोना काल शुरू होने के एक महीने बाद अप्रैल महीने से कील-मुंहासों के लिए सबसे ज्यादा बिकने वाली दवा आइसोट्रोइन कैप्सूल की कीम तब 150 से 160 रुपये थी, वहीं अब इसकी कीमत 250 से 270 रुपये तक हो गई है। इसी तरह एंटी फंगल क्रीम लूलोकोनोजोल के दस ग्रीम के ट्यूब की कीमत करीब छह महीने पहले 120 रुपये थी। नवंबर माह में इसकी कीमत 150 से 170 रुपये हो गई है। एक अन्य दवा केटाकोनाजोल की कीमत छह माह पहले 60 से 65 रुपये थी, जिसके लिए अब मरीजों को 90 से 120 रुपये अदा करने पड़ रहे हैं। इन दवाओं की जरूरत मरीजों को कोर्स पूरा होने तक होती है। त्वचा के इलाज में दवाओं का रोज-रोज बदलना मुमकिन नहीं होता, इसलिए मजबूरी में बढ़े दामों पर मरीज इन दवाओं को खरीद रहे हैं। 
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Medicine

चाइना बाजार से परहेज बना है मूल्य वृद्धि का कारण

थोक, फुटकर दवा विक्रेताओं ने रोज-रोज की चिकचिक से परेशान होकर जब फार्मा कंपनियों के प्रतिनिधि से बात की तो उनका जवाब था, चाइना बाजार से परहेज दवाओं के दाम में बढ़ोत्तरी का कारण है। दवा प्रतिनिधियों के मुताबिक जो साल्ट चाइना से चार से छह हजार रपये में आता था, उसे वाया सिंगापुर, मलेशिया से मंगाने पर कंपनियों को लगभग डेढ़ गुना मूल्य अदा करना पड़ रहा है। एंटीबायोटिक के साल्ट दवा की गुणवत्ता बनाए रखने और मानक का पालन करने के लिए विदेश से मंगाने पड़ रहे हैं, क्योंकि उनकी अपने देश में पेटेंट कानूनों के तहत उपलब्धता ही नहीं है। कुछ दवाओं के दाम में वृद्धि का यही कारण है। 

पेटेंट दवाओं की निर्माता कंपनियों ने कुछ दवाओं के दाम बढ़ाए हैं। इसके विपरीत एक-दो दवाओं को छोड़कर अभी जेनरिक दवाओं के दाम पूर्ववत है। कोशिश बाजार में दवाओं की उपलब्धता कराने में रहती है, इसलिए बढ़े मूल्यों पर दवाओं की खरीद-बिक्री करनी पड़ती है। - अनिल दुबे, अध्यक्ष इलाहाबाद केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन 
 
  • दवाओं के मूल्य निर्धारण का अधिकार राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण की ओर से किया जाता है। दवाओं के दाम बढ़ाने से पहले कंपनियां इसकी अनुमति लेती हैं। स्थानीय स्तर पर दवाओं के दाम नहीं बल्कि उनकी उपलब्धता और कालाबाजारी न हो, इस पर नजर रहती है। हमारी टीमें निर्धारित मूल्य से अधिक पर दवाओं की बिक्री न की जाए, इसकी निगरानी करती है। फिलहाल, अधिक दाम वसूलने की शिकायत नहीं मिली है। -गोविंद लाल गुप्ता, औषधि निरीक्षक
 
  • कुछ दवाओं के दामों में वृद्धि के कारण फुटकर दवा बेचने वाले को ग्राहकों और मरीजों की खरी खोटी सुननी पड़ती है। इसका सीधा हल मुनाफा छोड़कर दाम लिए जाते हैं। कंपनियों और थोक विक्रेताओं से इस बारे में आपत्ति दर्ज करा दी गई है। कोशिश रहती है कि मरीजों को कम दाम में पेटेंट दवाएं उपलब्ध हों। - राणा चावला, अध्यक्ष प्रयाग केमिस्ट एसोसिएशन (फुटकर)
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