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प्रयागराज : लेखपाल भर्ती में विशिष्ट दिव्यांगों को आरक्षण से बाहर करना सरकार की गलती

Fri, 11 Sep 2026 07:08 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लेखपाल भर्ती में विशिष्ट दिव्यांगता (चलने संबंधी दिव्यांगता) वाले अभ्यर्थियों को आरक्षण से बाहर किए जाने को सरकार की गलती करार दिया है।
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अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लेखपाल भर्ती में विशिष्ट दिव्यांगता (चलने संबंधी दिव्यांगता) वाले अभ्यर्थियों को आरक्षण से बाहर किए जाने को सरकार की गलती करार दिया है। कोर्ट ने कहा कि सरकारी गलती का खामियाजा अभ्यर्थियों को नहीं भुगतना चाहिए। कोर्ट ने निर्देश दिया कि 8085 लेखपाल पदों में दिव्यांगों के एक प्रतिशत आरक्षण को पूरा करने के लिए यदि रिक्त पद उपलब्ध हैं तो पात्र याचियों को नियुक्ति दी जाए। रिक्त पद उपलब्ध नहीं होने पर उनके समायोजन के लिए अतिरिक्त पद सृजित किए जाएं।

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यह आदेश न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने मेरठ की नीतू कुमार और 21 अन्य विशेष रूप से दिव्यांग अभ्यर्थियों की याचिका स्वीकार करते हुए दिया। याचियों ने 30 जुलाई 2021 के शासनादेश को चुनौती दी थी। इसके जरिये लेखपाल पद पर आरक्षण के लिए विशिष्ट दिव्यांगता की श्रेणी को बाहर कर दिया गया था।

याचियों का कहना था कि वे अन्य सभी पात्रताएं पूरी करते थे लेकिन 2021 के शासनादेश के कारण उन्हें दिव्यांग आरक्षण का लाभ नहीं मिला और नियुक्ति से वंचित रह गए। बाद में राज्य सरकार ने 30 सितंबर 2024 के शासनादेश से विशिष्ट दिव्यांगता की श्रेणी को फिर से बहाल कर दिया। राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि लेखपाल के काम की प्रकृति को देखते हुए विशिष्ट दिव्यांगता की श्रेणी को भर्ती में शामिल नहीं किया गया था।

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हाईकोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 34(1) के तहत हर सरकारी संस्थान में दिव्यांगता वाले व्यक्तियों के लिए कम से कम चार प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है। इसमें विशिष्ट दिव्यांगता को भी एक प्रतिशत आरक्षण वाली श्रेणी में शामिल किया गया है। ऐसे में 30 जुलाई 2021 का शासनादेश अधिकार क्षेत्र से बाहर जारी किया गया था। कोर्ट ने माना कि विशिष्ट दिव्यांगता की श्रेणी को हटाने और फिर 30 सितंबर 2024 को बहाल करने के पीछे कोई उचित कारण या तर्क नहीं था। यह सरकार की गलती थी और उसका नुकसान याचियों को नहीं उठाना चाहिए।
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