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कसौटी पर कसे जाएं यूपी बोर्ड परीक्षा के टॉपर्स

Tue, 28 Jun 2016 02:14 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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बिहार राज्य शिक्षा बोर्ड की परीक्षा में बारहवीं की टॉपर छात्रा की गिरफ्तारी के बाद पूरी परीक्षा प्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। जांच में उक्त छात्रा को टॉप कराने में बोर्ड के प्रमुख के साथ छात्रा के अभिभावकों की मिली भगत सामने आई है। इस बीच सवाल उठे हैं कि टॉप की रेस में उक्त छात्रा किस तरह दोषी है तो यह भी कि सीबीएसई की तर्ज पर अधिक अंक देने तथा जेईई मेंस में अंक जोड़े जाने जैसी पहल की होड़ ने नहीं इस हद तक बेईमानी करने पर विवश किया। बीते एक दशक में ऐसी प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। बिहार की घटना के बाद यूपी में भी शिक्षा विभाग के अधिकारियों एवं प्रधानाचार्यों ने यूपी बोर्ड की परीक्षा में प्रदेश एवं जिले के टापर्स की पड़ताल कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यूपी बोर्ड परीक्षा में भी टॉप करने वाले तमाम परीक्षार्थी अचानक आगे की कक्षाओं में कैसे अंधेरे में खो जाते हैं।
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यूपी बोर्ड टॉपर्स भी परखे जाएं
 शिक्षाविदें का कहना है कि बिहार राज्य शिक्षा बोर्ड की घटना के बाद यूपी बोर्ड के टॉपर्स की भी जांच-परख होनी चाहिए। विद्या भारती की ओर से संचालित माधव ज्ञान केंद्र इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य प्रदीप कुमार त्रिपाठी कहते हैं, एक ही स्कूल के कई विद्यार्थी एक साल तो मेरिट में आते हैं परंतु अगले ही वर्ष वहां के एक भी छात्र मेरिट में जगह नहीं बना पाते। हाईस्कूल की मेरिट में यूपी का टॉपर इंटरमीडिएट में कहां खो जाता है, पता ही नहीं चलता है। ऐसे में यूपी बोर्ड एवं प्रदेश सरकार को भी अपने टॉपर्स की जांच करनी चाहिए। रानी रेवती देवी सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य आत्मानंद सिंह ने भी एक प्रेसवार्ता में परीक्षाफल की समीक्षा की मांग की थी।

ग्रेडिंग लागू होने के बाद बरसे अंक
यूपी बोर्ड परीक्षा के बीते 15 वर्षों के परिणाम का अध्ययन करने पर पता चलता है कि वर्ष 2009 में ग्रेडिंग व्यवस्था लागू होने के यहां के रिजल्ट में बूम आया। यूपी बोर्ड ने ग्रेडिंग के आधार पहली बार 2010 में परीक्षा परिणाम जारी किया। साथ ही दसवीं की बोर्ड परीक्षा में सभी परीक्षार्थी पास होने लगे। वहीं बारहवीं में 95 फीसदी से अधिक अंक देने की होड़ सीबीएसई की तर्ज पर वर्ष 2012-13 से शुरू हुई। 2014 में यह प्रक्रिया तेजी से बढ़ी और बारहवीं के अंक को जेईई मेंस में जोड़े जाने से बोर्ड के तत्कालीन निदेशक ने परीक्षकों से स्टेप मार्किंग करने के लिए खुलकर कहा ताकि यूपी बोर्ड के छात्रों को भी आईआईटी, एनआईटी जैसे संस्थानों में प्रवेश मिल सके।
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मेरिट में बढ़ोतरी के लिए राज्य सरकारें जिम्मेदार
प्रदेश सरकार के पूर्व शिक्षा अधिकारी राज सिंह कहते हैं, यूपी बोर्ड परीक्षा में 20 वर्ष पहले रिजल्ट पचास फीसदी से भी कम होते थे। प्रदेश में अलग-अलग समयों पर बनी राज्य सरकारों की ओर से नकल करने पर दंडित करने एवं नहीं करने के दावे से मेरिट कुछ आगे बढ़कर 50 से 60 फीसदी के बीच रही। सीबीएसई एवं आईसीएसई की तर्ज पर यूपी बोर्ड ने भी स्टेप मार्किंग के जरिए छात्रों को जमकर नंबर लुटाए। इसी का परिणाम यह है कि वर्तमान समय में मेरिट 95 फीसदी जा पहुंची है। बिहार की तर्ज पर यूपी बोर्ड के टापर्स के अंकों की भी जांच होनी चाहिए।

पॉलीटेक्निक प्रवेश परीक्षा में बिहार बोर्ड की छाया
प्रदेश के सरकारी एवं निजी पॉलीटेक्निक कॉलेजों के लिए हुई प्रवेश परीक्षा में गाजीपुर जिले केएक परीक्षा केंद्र के छात्रों के टॉप मेरिट में आने के बाद जांच में बिहार बोर्ड जैसा मामला सामने आया है। पता चला कि यह टॉपर शुद्घ हिंदी तक नहीं लिख पाए। पूछे गए सवालों का जवाब भी सही नहीं मिला। बिहार राज्य शिक्षा बोर्ड की परीक्षा में भी ऐसी ही गड़बड़ी मिली थी।
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