हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि किसी अपराध में अभियुक्तों की भूमिका में समानता (पैरिटी) होना जमानत देने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता है। हर अभियुक्त के मामले में तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के उपरांत ही जमानत देने या नहीं देने पर निर्णय लिया जा सकता है। हाईकोर्ट ने हाथरस में दोहरे हत्याकांड के आरोपी गजेंद्र सिंह की जमानत इसी आधार पर खारिज कर दी है। जबकि, इसी मामले में सहअभियुक्त की जमानत पहले ही मंजूर हो चुकी है। जमानत प्रार्थनापत्र पर न्यायमूर्ति रवींद्र नाथ तिलहरी ने सुनवाई की।
जमानत प्रार्थनापत्र का विरोध कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अनूप त्रिवेदी का कहना था कि पैरिटी जमानत देने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता है। उन्होंने सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट के कई न्यायिक निर्णयों का हवाला दिया, जिसमें पैरिटी को जमानत का आधार नहीं मानते हुए प्रार्थनापत्र निरस्त किए गए हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने मौजी राम बनाम राज्य, राकेश कुमार पांडेय बनाम मुन्नी सिंह उर्फ माता बख्श सिंह, रमेश व अन्य आदि केसों में सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा पारित विधि सिद्धांतों की नजीरें पेश कीं। इनमें अपराध में समानता को जमानत देने का आधार स्वीकार नहीं किया गया है। सलीम बनाम स्टेट ऑफ यूपी में हाईकोर्ट ने कहा है कि पैरिटी जमानत का एकमात्र आधार नहीं है। इसी प्रकार से राकेश कुमार पांडेय केस में सुप्रीमकोर्ट ने पैरिटी पर जमानत देने की निंदा की है।
मामले के अनुसार नौ जून 2018 को हाथरस के जंक्शन थाना क्षेत्र में ग्राम प्रधान चुनाव की रंजिश में भुक्तभोगी राजकुमार के घर पर 11 अभियुक्तों ने धावा बोल दिया। अंधाधुंध फायरिंग की, जिसमें राजकुमार के भाई नेत्रपाल और प्रताप की मौके पर ही मौत हो गई। राजकुमार को भी गोलियां लगीं, मगर वह बच गया। बचाव पक्ष का कहना था कि अभियुक्त हरेंद्र पर लगे आरोप सामान्य किस्म के हैं।
पुलिस ने उसके पास से 315 बोर का तमंचा बरामद किया है, जबकि मृतकों को 312 बोर के असलहे से चोटें पहुंची हैं। एक अन्य अभियुक्त हरेंद्र के पास से भी 315 बोर का तमंचा बरामद किया गया है। हरेंद्र की जमानत मंजूर हो गई है, इसलिए गजेंद्र को भी इसी आधार पर जमानत दी जाए। कोर्ट ने इसे अस्वीकार करते हुए कहा कि हरेंद्र का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था, जबकि गजेंद्र पर पहले से कई मुकदमे हैं, इसलिए समानता का लाभ नहीं मिल सकता।