राजनीति में एक समय ऐसा भी था जब नारों की बड़ी अहमियत होती थी। नारे इतने दमदार होते थे कि प्रत्याशी उसके बल पर मतदाताओं को अपने पक्ष में करके चुनाव जीत लिया करते थे। उस दौर के नारे लंबे समय तक याद रखते थे। एक कॉमन नारा होता था जो हर प्रत्याशी के समर्थन में लगाया जाता था ‘कोई नहीं टक्कर में क्यों पड़े हो चक्कर में।’ लेकिन जैसे-जैसे चुनाव का परिदृश्य बदला नारों की अहमियत भी कम होने लगी और इसकी जगह नोट और बाहुबल ज्यादा दिखने लगा।
आजादी के बाद 1952 में जनसंघ की स्थापना हुई। जनसंघ का चुनाव निशान था दीपक। उस दौरान नारा दिया गया ‘हर हाथ को काम हर खेत को पानी, घर-घर दीपक जनसंघ की निशानी।’ 1967 के चुनाव में जनसंघ का नारा था ‘उज्ज्वल भविष्य की है तैयारी, बच्चा-बच्चा अटल बिहारी’। इसी वर्ष विश्वनाथ प्रताप सिंह सोरांव विधानसभा से मैदान में उतरे थे। उनके लिए नारा बना ‘राजा नहीं फकीर है, भारत की तकदीर है’, ‘वीपी नहीं ये आंधी है, इलाहाबाद का गांधी है।’ वर्ष 1974 में इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं और महंगाई चरम पर थी। उस दौरान हुए विधानसभा चुनाव में इंदिरा और महंगाई को लेकर विपक्ष ने नारा दिया ‘ये देखो इंदिरा का खेल, खा गईं राशन पी गई तेल।’ इसी वर्ष कांग्रेस के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने नारा दिया था ‘इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा’। विपक्ष ने कांग्रेस के खिलाफ नारा दिया ‘धन और धरती बंटकर रहेगी, भूखी जनता चुप न रहेगी।’
वर्ष 1980 में ऐसा दौर भी आया जब कई नेताओं ने कांग्रेस को छोड़कर दूसरी पार्टी ज्वाइंट कर ली। इसे लेकर भी नारा बना ‘दलबदलू फंसा शिकंजे में मुहर लगेगी पंजे में।’ इसी वर्ष लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ हुए। उस वक्त केंद्र और प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार थी लेकिन यह सरकार 19 माह में गिर गई। उस दौरान कांग्रेस ने नारा दिया ‘जनता पार्टी जपा-जपा, 19 माह में रफा दफा’, तथा ‘जात पर न पात पर इंदिरा जी बात पर मुहर लगेगी हाथ पर’। 1985 में कांग्रेस शासन के दौरान चीनी की कीमत सात रुपये किलो तक पहुंच गई थी, जबकि उसके पहले की सरकार में चीनी तीन रुपये किलो थी, सो विधानसभा चुनाव में विपक्षी पार्टियों ने नारा दिया ‘चीनी मिलेगी सात पर जल्दी पहुंचोगे खाट पर, इंदिरा जी की बात पर पहुंच जाओगे घाट पर’।
वर्ष 1985 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी का नारा था ‘तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार।’ वर्ष 1996 के विधानसभा चुनाव में बसपा का नारा था ‘चढ़ गुंडन की छाती पर, बटन दबाओ हाथी पर’। इसके जवाब में विपक्ष ने नारा दिया ‘चढ़ बहुजन के हाथी पर, गोली मारो छाती पर।’ सत्तर के दशक में जनता पार्टी के युवा नेता रहे केके श्रीवास्तव बताते हैं कि उस दौैर से 80 के दशक तक साफ-सुथरी छवि वाले नेता मैदान में उतरे थे। उनके समर्थन और विरोध में लगने वाले नारों का मतदाताओं पर खासा असर होता था। नारों के बल पर हार-जीत तय होती थी लेकिन समय के चक्र में फंस कर अब नारे जाने कहां गुम हो गए।