मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के गैस्ट्रोइंट्रोलॉजी एवं हिपैटोलॉजी विभाग, गैस्ट्रो क्लब, इलाहाबाद मेडिकल एसोसिएशन एवं एसोसिएशन ऑफ फिजीशियन ऑफ इंडिया के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन रविवार को उपचार की कई नई विधियों पर चर्चा हुई। नई दिल्ली के डॉ. रणधीर सूद ने कैप्सूल इंडोस्कोपिक के बारे में बताया। कहा कि इससे आंतों का सूक्ष्म अध्ययन किया जा सकता है।
डॉ. रणधीर सूद ने बताया कि इसमें एक कैप्सूल मरीज को निगलने के लिए दिया जाता है, जिसकी इमेज कंप्यूटर पर आसानी से देख सकते हैं। उन्होंने बताया कि इससे उदर आंत रक्तस्राव, पॉलिप, ट्यूमर, स्ट्रिक्चर, सिलिएक, कोहम्स आदि बीमारियों का आसानी से निदान किया जा सकता है। उन्होंने इसे सफल और सरल विधि बताई। कहा कि इसमें बायोप्सी कराने की जरूरत नहीं पड़ती। डॉ. वीके मिश्रा ने ‘डिस्पेप्सिआ’ के प्रबंधन की जानकारी दी। कहा कि सीने के ऊपरी हिस्से में दर्द, जलन, खाना खाना के बाद पेट फूलने या असुविधा जैसी समस्या के साथ 40 फीसदी से अधिक मरीज आते हैं।
उन्होंने इसका कारण दुश्चिंता, तनाव या फिर अन्य मनोवैज्ञानिक कारण हो सकता है। एम्स नई दिल्ली से आए गैस्ट्रोइंट्रोलॉजिस्ट डॉ. एसके सरीन ने हेपटाइटिस बी के प्रबंधन में हुई प्रगति के बारे में बताया। कोची से आए डॉ. जीएन प्रसाद ने क्रॉनिक पैंक्रिएटाइटिस के मरीजों में दर्द, सिकुड़न, पथरी का इंडोस्कोपिक द्वारा आसानी से निकल जाती है, लेकिन उससे बड़ी पथरी का उपचार ‘ईएसडब्ल्यूएल’ तकनीकी के द्वारा करते हैं, जिससे पहले पहले बड़ी पथरी को तोड़ते हैं फिर इंडोस्कोपी द्वारा आसानी से निकाल देते हैं। कार्यक्रम में डॉ. एके चौधरी सहित कई विशेषज्ञों ने अपनी बात रखी।