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High Court : एक ही मामले में दो विरोधाभासी आदेश जारी होने की जिला जज करेंगे जांच, कोर्ट ने दिया आदेश

Thu, 10 Oct 2024 05:00 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की कोर्ट ने पारुल अग्रवाल की अर्जी पर यह आदेश दिया। संबंधित अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट वर्तमान में अब एक अलग जिले में तैनात हैं। उनके खिलाफ कार्रवाई करने से कोर्ट ने परहेज किया, जबकि अदालत ने पाया कि उन्होंने सावधानी नहीं बरती थी और संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ जांच भी शुरू नहीं की थी।
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अदालत(सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद के जिला न्यायाधीश को मानहानि के एक मामले में दो विरोधाभासी आदेश जारी किए जाने की जांच करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि यह भी जांच करें कि किन परिस्थितियों में संबंधित न्यायालय के कर्मचारियों ने वेबसाइट पर अहस्ताक्षरित मसौदा आदेश अपलोड किए हैं। कोर्ट ने कहा कि संबंधित अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के एक युवा मजिस्ट्रेट हैं। उनके लंबे करियर को ध्यान में रखते हुए उनके खिलाफ कोई प्रतिकूल आदेश पारित नहीं कर रहा हूं।

न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की कोर्ट ने पारुल अग्रवाल की अर्जी पर यह आदेश दिया। संबंधित अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट वर्तमान में अब एक अलग जिले में तैनात हैं। उनके खिलाफ कार्रवाई करने से कोर्ट ने परहेज किया, जबकि अदालत ने पाया कि उन्होंने सावधानी नहीं बरती थी और संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ जांच भी शुरू नहीं की थी।

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गाजियाबाद के रहने वाले दंपती ने आवेदक के खिलाफ मानहानि का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई थी। ट्रायल कोर्ट ने 13 फरवरी को शिकायत पर एक ही दिन में दो आदेश पारित कर दिए। पहले आदेश में मानहानि की शिकायत खारिज कर दी गई थी, जबकि दूसरे आदेश में आरोपी को मुकदमे का सामना करने के लिए बुलाया गया था। इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

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आवेदक के वकील ने दो आदेश जारी करने की पूरी जानकारी कोर्ट को दी। कोर्ट को बताया कि जिस आदेश से शिकायत खारिज की गई थी, उस पर हस्ताक्षर नहीं थे। जबकि जिस आदेश से अभियुक्त को बुलाया गया था, वह हस्ताक्षरित आदेश था। न्यायालय ने मजिस्ट्रेट से स्पष्टीकरण मांगा था। जवाब में न्यायिक अधिकारी ने बिना शर्त माफी मांगी और बताया कि उनके न्यायालय के कर्मचारियों ने अनजाने में एक अहस्ताक्षरित और मसौदा आदेश अपलोड कर दिया था। कोर्ट ने दोनों आदेशों को रद्द करते हुए मामले को नए सिरे से निर्णय लेने के लिए पुनः ट्रायल कोर्ट को भेज दिया । साथ ही तीन महीने के भीतर कानून के अनुसार नया आदेश पारित करने का आदेश दिया।

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