अखाड़े की स्थापना अयोध्या में हुई थी। इसका काल तो स्पष्ट नहीं है, लेकिन माना यही जाता है कि 500 साल पहले धर्म रक्षा के लिए ही इसका गठन हुआ था। दिगंबर निंबार्की अखाड़े के रूप में श्याम दिगंबर और रामानंदी में यही अखाड़ा राम दिगंबर कहलाता है।
अखाड़े की चार पट्टियां भी हैं, सागरिया, उज्जैनिया, हरिद्वारी और बसंतिया। हर पट्टी में तीन जमातें होती हैं, खालसा, झुंडी और डुंडा। हर जमात में दो थोक भी होते हैं, जिन्हें परिवार कहा जाता है। हर परिवार में आसन होते हैं, जिन्हें संतों का निवास स्थान कहा जाता है। इस अखाड़े के सारे विवाद हनुमानगढ़ी में सुने जाते हैं। वहां की परंपरा के अनुसार ही इस पंरपरा के वैष्णव संतों के विवादों का निबटारा होता है। इस अखाड़े के पास अकूत संपदा है। मठों-मंदिरों के पास अपनी खेती भी है। संतों की टोलियां ही खेती कराती हैं। इसी से साधु-संन्यासियों के लिए भोजन, प्रसाद, फलाहार और वस्त्र आदि की व्यवस्था की जाती है।
महाकुंभ के समय ही होता है श्रीमहंत का चुनाव
दिगंबर अनि अखाड़े में चुनाव के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाई जाती है। सर्वोच्च पद श्रीमहंत का है, जिसका हर 12 वर्ष पर महाकुंभ के दौरान ही चुनाव होता है। इस अखाड़े के कई उप अखाड़े भी गठित हैं। नंदराम दास बताते हैं कि खाकी अखाड़ा, हरिव्यासी अखाड़ा, संतोषी अखाड़ा, निरावलंबी अखाड़ा, हरिव्यासी निरावलंबी अखाड़ा इसी के अंग के रूप में काम करते हैं।