इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि नाम की वर्तनी में गलती के आधार पर जमानत पाए व्यक्ति की रिहाई में देरी नहीं की जा सकती। यह स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति समीर जैन की अदालत ने जमानत पाने के बावजूद 17 दिन तक रिहाई का इंतजार कर रहे ब्रह्मशंकर को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है। मामला मेरठ के भ्रष्टाचार विरोधी थाना क्षेत्र का है। आरोपी बुलंदशहर में फील्ड अफसर के पद पर तैनात था। पांच हजार रुपये रिश्वत लेने के आरोप में 13 मार्च 2024 से जेल में निरुद्ध था।
जिला अदालत से जमानत अर्जी खारिज होने के बाद उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अदालत ने आठ जुलाई को याची की जमानत अर्जी मंजूर कर ली, लेकिन उसके नाम की वर्तनी में मामूली सी त्रुटि हो गई। इससे जमानत मिलने के बावजूद उसे 17 दिनों तक अतिरिक्त जेल में रहना पड़ा।
कोर्ट ने याची की ओर से पेश सुधार प्रार्थना पत्र को स्वीकार कर अन्य प्रमाण पत्रों की पुष्टि करते हुए याची को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि नाम की वर्तनी में मामूली सी गलती के कारण याची को बेवजह जेल में नहीं रखा जा सकता।
किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद-21 में निहित उसका मौलिक अधिकार है। इसे वर्तमान मामले की तरह मामूली तकनीकी आधार पर नहीं छीना जा सकता। --इलाहाबाद हाईकोर्ट