इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 21 साल पुराने दहेज उत्पीड़न के मुकदमे में अब तक ट्रायल शुरू नहीं होने पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि सुनवाई में देरी न्याय की नींव पर आघात है। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की अदालत ने मेरठ की सुधा अग्रवाल उर्फ सुधा गर्ग की याचिका स्वीकार कर ली। मामला मेरठ के नौचंदी थाना क्षेत्र का है।
कोर्ट ने मुरादाबाद की अदालत को आदेश दिया कि मुकदमे की सुनवाई दिन-प्रतिदिन या साप्ताहिक आधार पर हो, बिना वजह स्थगन न दिया जाए। साथ ही आरोपी अगली तारीख से हर पेशी पर मौजूद रहें। गैर हाजिरी पर आरोपी का बेल बॉन्ड जब्त कर गैर-जमानती वारंट जारी किए जाएं और जरूरत पड़ने पर आरोपी को हिरासत में लेकर पेश किया जाए।
याचिका में बताया गया कि पीड़िता का विवाह 2003 में हुआ। आरोप है कि 2004 में ससुराल वालों ने दहेज की मांग के चलते उसे घर से निकाल दिया। इसके बाद बच्चों से भी अलग कर दिया गया। पत्नी ने ससुरालियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई। पुलिस ने विवेचना के बाद आरोप पत्र दाखिल कर दिया। इसी दौरान आरोपियों ने हाईकोर्ट से स्थगन आदेश ले लिया, जो वर्ष 2010 तक चला। स्थगन आदेश खत्म होने के बाद अब तक न गवाही हुई, न आरोप तय हुआ। कुछ समय बाद मुकदमा मेरठ की जिला अदालत से मुरादाबाद स्थानांतरित हो गया। मामले के ट्रायल में हो रही देरी के खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
अदालत की टिप्पणी
निष्पक्ष और त्वरित सुनवाई हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। जब अदालतें इसे सुनिश्चित करने में विफल होती हैं तो न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा डगमगा जाता है : हाईकोर्ट