इलाहाबाद। गत 11 मार्च को जिला कचहरी में अधिवक्ता नबी अहमद की हत्या के बाद हुए बवाल और वकीलों के आंदोलन पर मंथन करने बैठी सात जजों की वृहदपीठ ने कहा है कि नैतिक अधमता (मॉरल टरर्पीट्यूड) (ऐसा कार्य जो अधिवक्ता समाज के लिए निर्धारित मानकों के विपरीत आचरण की श्रेणी में आता है) के दोषी वकीलों को बार का चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं है। वृहदपीठ ने प्रदेश के सभी जिला जजों को नैतिक अधमता के दोषी वकीलों की पहचान कर चुनाव लड़ने से रोकने का निर्देश दिया है। ऐसे जो लोग मौजूदा समय में किसी अधिवक्ता संघ के पदाधिकारी हैं उनको अयोग्य करार देने का निर्देश दिया है।
वृहद पीठ के समक्ष आपराधिक मामलों में सजा पाए वकीलों को वकालत से रोकने का मुद्दा भी उठा मगर इस पर बहस पूरी नहीं हो सकी। जिला न्यायालयों की सुरक्षा को लेकर निर्देश दिया है कि जहां पर अदालत परिसर की बाउंड्रीवॉल टूटी है उसकी मरम्मत कराई जाए। अदालतों में वीडियो कांफ्रेंसिंग की सुविधा और सीसीटीवी लगाने के लिए राज्य सरकार को शीघ्र कदम उठाने का निर्देश दिया है।
वृहद पीठ ने महाधिवक्ता विजय बहादुर सिंह को सुरक्षा उपायों के होने वाले कार्यों की मॉनिटरिंग करने को कहा है। अदालत परिसर में प्रवेश के लिए बायोमैट्रिक कार्ड की व्यवस्था करने का भी सरकार को निर्देश दिया है। कोर्ट ने सभी अधिवक्ता संघों को निर्देश दिया है कि वह सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट की धारा 16(ए) के तहत अपने बॉयलॉज में संशोधन करें।
वृहद पीठ ने महानिबंधक को निर्देश दिया है कि वह हाईकोर्ट परिसर में नारेबाजी करने वाले वकीलों की पहचान कर सूचित करें। वकीलों से भी अपील की है कि वह स्वयं को कोर्ट के समक्ष उपस्थित होकर क्षमायाचना के लिए प्रस्तुत करें। वृहदपीठ में मुख्य न्यायमूर्ति डॉ. डीवाई चंद्रचूड, न्यायमूर्ति राके श तिवारी, न्यायमूर्ति राजेश कुमार, न्यायमूर्ति वीके शुक्ल, न्यायमूर्ति अरुण टंडन, न्यायमूर्ति तरुण अग्रवाल और न्यायमूर्ति दिलीप गुप्ता पीठासीन थे। बार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रवि किरन जैन, बार के अध्यक्ष राकेश तिवारी, राधाकांत ओझा, विजय चंद्र श्रीवास्तव आदि ने पक्ष रखा।