इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे सिविल मामले, जिनमें विशेष रूप से फौजदारी का आरोप है, सिविल मामला लंबित होने के बावजूद आपराधिक वाद चलाया जा सकता है। कोर्ट ने सिविल वाद का हवाला देते हुए दर्ज किए गए धोखाधड़ी सहित अन्य मुकदमों को रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। यह आदेश न्यायमूर्ति विवेक कुमार बिड़ला व न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने हुसैन जैदी उर्फ गुड्डू की याचिका पर दिया है।
मेरठ निवासी याची हुसैन जैदी उर्फ गुड्डू पर 2024 में थाना सिविल लाइंस में धोखाधड़ी सहित विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया गया था। याची ने दर्ज मुकदमों को रद्द करने के लिए हाईकोर्ट से गुहार लगाई थी। याची के वकील ने दलील दी कि एक जाली पारिवारिक समझौता के मामले में धोखाधड़ी सहित अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया गया है, जबकि इसमें पहले ही सिविल वाद लंबित है। कहा कि सिविल विवाद को आपराधिक रंग दिया गया है। इसलिए एफआईआर रद्द की जानी चाहिए।
वहीं, प्रतिवादी के वकील ने याचिका का विरोध किया। दलील दी कि एफआईआर के अवलोकन से यह स्पष्ट है कि जाली पारिवारिक समझौता तैयार करके जालसाजी करने का विशिष्ट आरोप है। इसलिए आपराधिक मुकदमा चलना चाहिए। अपर शासकीय अधिवक्ता ने दलील दी कि प्रथम सूचना रिपोर्ट के पंजीकरण से पहले प्रारंभिक जांच की गई थी।
कोर्ट ने कहा कि उन सिविल मामलों में जहां जालसाजी करने के विशिष्ट आरोप हैं। साथ ही की गई शिकायत में मुख्य रूप से आपराधिक प्रकृति के आरोप हैं। ऐसे में भले ही पक्षों के बीच दीवानी कार्यवाही लंबित है। आपराधिक कार्यवाही जारी रखने पर कोई रोक नहीं है। कोर्ट ने कहा कि आरोपित एफआईआर के अवलोकन से संज्ञेय अपराध बनता है। इसलिए आरोप की जांच होनी चाहिए। कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।