चौक में जहां क्रांतिकारियों को फांसी दी जाती थी, उस पेड़ के भी चारो तरफ अतिक्रमण के चलते खड़ा होने की जगह नहीं बची है। यादगार के रूप में यहां खड़े नीम के बुजुर्ग पेड़ के चारो तरफ दुकानें लगने लगी हैं। इससे वहां 1857 में क्रांतिकारियों को दी गई फांसी से संबंधित शिलापट्ट भी ठीक से दिखाई नहीं देता। इस पेड़ के ठीक सामने नगर निगम का सबसे चटख बाजार बरांडा में इस कदर अतिक्रमण है कि दो खरीददार इसकी गलियों में एक साथ नहीं चल सकते। संकरी गलियों में एक-दूसरे से धक्के खाते, बचते हुए लोग किसी तरह गुजर पाते हैं। रोज की इस दिक्कत से परेशान कारोबारी इस समस्या से निजात तो चाहते हैं, लेकिन उनकी पीड़ा है कि इसकी अगुवाई कौन करे।
शहीदों की निशानी के तौर पर कभी यहां रहे इमली के सात पेड़ अब कट चुके हैं। उसी जगह यादगार के तौर पर एक नीम का पेड़ कभी लगाया गया था, जो वर्षों से झुक कर टेढ़ा हो चुका है। इस ऐतिहासिक के पेड़ के नीचे अब शिवलिंग, पूजन सामग्री, चुनरी और पोथियों की दुकान लगती है। अगर कोई पेड़ के नीचे जाना भी चाहे तो नहीं जा सकता। कल्याणी देवी मुहल्ले के अंकुर मेहरोत्रा बताते हैं कि कभी कोतवाली में ही अंग्रेज पकड़े गए क्रांतिकारियों को फांसी की सजा सुनाते थे और इसी पेड़ के नीचे उन्हें फांसी पर लटकाया जाता था। वहां लगे शिलापट्ट से इसकी ऐतिहासिकता के प्रमाण मिलते हैं, लेकिन उसके संरक्षण की बजाए, वहां अतिक्रमण कर लिया गया और प्रशासन बेपरवाह बना हुआ है।
यहां से चंद कदम पर मशहूर बारांडा मार्केट है। इस मार्केट की चकाचौंध देखते बनती है लेकिन अतिक्रमण की भी भरमार है। नगर निगम की ओर से आवंटित इस मार्केट की कई दुकानों में एक की जगह तीन-तीन हिस्सेदारों ने दीवारें खड़ी कर अलग कारोबार खड़ा कर लिया है। मार्केट की गलियां इतनी संकरी हैं कि दो लोग सीधे चलने लगे तो किसी का कंधा सटेगा तो किसी का हाथ। सौंदर्य प्रसाधन, गिफ्ट आयटम की दुकानों के चलते इस बाजार में भीड़ लगी रहती है। कारोबारी पवन जैन बताते हैं कि कभी इसी बरांडा के सामने अंग्रेजों के घोड़े बांधे जाते थे। अभी तक उनकी चरनी के निशान वहां मौजूद हैं।
लाल बहादुर शास्त्री जब कभी इस इलाके से चुनाव लड़े थे, तब की उनको जिताने की अपील वाली वाल राइटिंग भी अभी वहां देखी जा सकती है लेकिन अतिक्रमण के चलते यह बाजार बी चौपट होने के कगार पर है। मजे की बात तो यह है कि इसी मार्केट में नगर निगम के कर्मियों का एक दफ्तर भी है, जहां आसपास अवैध रूप से लगने वाली दुकानों का सामान शाम को रखवा दिया जाता है। जब तक नगर निगम और पुलिस की संयुक्त टीम ईमानदारी से अभियान नहीं चलाएगी, तबतक इस इलाके को अतिक्रमण और जाम से राहत नहीं मिल सकती।
इस इलाके में कोई भी पीएम-सीएम से नीचे बात नहीं करता। बीच सड़क पर पार्किंग या फिर बढ़कर दुकान लगाने से मना करने पर सीधे लोग कहते हैं कि सड़क किसी की बपौती नहीं है। बात-बात पर लोग झगड़ा पर उतारू हो जाते हैं।
संदीप माहेश्वरी-कारोबारी
अतिक्रमण के खिलाफ अभियान चलाने और पार्किंग की व्यवस्था करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। कारोबारियों को चाहिए कि वह अपनी दुकानों को बढ़ कर न लगाएं, लेकिन वहां ठेला, खोमचा और अवैध रूप से पार्किंग पर भी रोक लगनी चाहिए।
विशाल गोयल
यातायात पुलिस की तैनाती किसी भी प्वाइंट पर नहीं की गई है। इलाका अपने हाल पर जी रहा है। नियमित रूप से पुलिस गश्त करे और सड़कों पर मनमाना वाहन खड़ा करने वालों पर सख्ती की जाए तो स्थिति काफी सुधर सकती है।
विपिन कुमार अग्रवाल-कारोबारी
व्यापारी समाज इस समस्या के समाधान के लिए खुल कर प्रशासन का साथ देने के लिए तैयार है। हम लोग चाहते हैं कि यातायात पुलिस के साथ बैठक कर अतिक्रमण और जाम की समस्या का समाधान निकालें।
पवन जैन-व्यापारी नेता।